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  • शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, एकनाथ शिंदे की मुश्किलें बढ़ीं? कपिल सिब्बल ने उठाए बड़े सवाल

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    शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आज ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं। मामला शिवसेना के चुनाव चिन्ह के साथ-साथ आमदारों की अयोग्यता से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सिब्बल ने चुनाव आयोग के अधिकार और उसके फैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

    सुनवाई के दौरान सिब्बल ने कहा कि पार्टी में फूट, चुनाव चिन्ह और आमदारों की अयोग्यता तीन अलग-अलग मुद्दे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना शिवसेना का चुनाव चिन्ह एकनाथ शिंदे गुट को दे दिया।

    शिंदे की नियुक्ति का घटनाक्रम कोर्ट में पेश

    सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे की नियुक्ति से जुड़े घटनाक्रम को भी कोर्ट के सामने रखा गया। कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जिस व्यक्ति के अयोग्य होने का सवाल उठ रहा था, उसे मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने दिया गया।

    सिब्बल ने कहा कि घटनाक्रम को देखते हुए राजनीतिक मदद मिली और अयोग्यता के सवाल के बावजूद संबंधित व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनने दिया गया।

    उन्होंने चुनाव चिन्ह आवंटन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसके लिए निर्धारित नियमों का पालन किया जाना जरूरी है।

    ‘पार्टी में फूट और अयोग्यता अलग-अलग मुद्दे’

    कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि पार्टी में फूट और आमदारों की अयोग्यता दो अलग-अलग मुद्दे हैं।

    उनके मुताबिक, चुनाव आयोग ने दो-तिहाई विधायकों के एक समूह के आधार पर शिंदे गुट को मान्यता दी और चुनाव चिन्ह भी आवंटित किया। सिब्बल ने कहा कि पार्टी में फूट के सवाल और अयोग्यता के सवाल को एक साथ नहीं देखा जा सकता।

    इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि पार्टी में फूट, चुनाव चिन्ह और अयोग्यता के मुद्दों को एक साथ जोड़ा जा रहा है। सिब्बल ने स्पष्ट किया कि उनकी दलील में इन तीनों मामलों को एक नहीं माना जा रहा है।

    चुनाव आयोग के अधिकार पर कपिल सिब्बल का सवाल

    सिब्बल ने चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर भी महत्वपूर्ण दलीलें दीं।

    उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 29A के तहत चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, राजनीतिक दल के पंजीकरण के लिए जरूरी जानकारी मांगी जा सकती है, लेकिन आयोग ऐसी जानकारी नहीं मांग सकता जो पार्टी के लिए अनावश्यक हो।

    उन्होंने यह भी कहा कि पंजीकरण रद्द करने से जुड़ा निर्णय प्रशासनिक स्तर पर हुआ, न्यायिक स्तर पर नहीं।

    ‘हाईकोर्ट भी आयोग को पंजीकरण रद्द करने का आदेश नहीं दे सकता’

    कपिल सिब्बल ने आगे दलील दी कि हाईकोर्ट भी चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का निर्देश नहीं दे सकता।

    उन्होंने आयोग के अधिकारों में स्पष्टता की जरूरत बताते हुए आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्था अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर सकती है।

    सिब्बल ने कहा कि कानून बनाए जाते हैं, लेकिन कानून की कसौटी न्यायालय में होती है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आयोग के सामने कोई विषय था तो संबंधित पक्ष को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए थी और आयोग ने एकतरफा निर्णय कैसे लिया।

    ‘हमें आयोग ने नोटिस तक नहीं दिया’

    ठाकरे गुट की ओर से पैरवी करते हुए सिब्बल ने यह भी कहा कि इस मामले में उनके पक्ष को चुनाव आयोग की ओर से उचित नोटिस नहीं दिया गया।

    उन्होंने कहा कि प्रत्येक राजनीतिक दल को सबूतों के आधार पर अपनी बात रखने का अधिकार है। सिब्बल ने सवाल किया कि चुनाव आयोग ने तथ्यों की पूरी जांच करने के बाद फैसला क्यों नहीं दिया।

    उनके अनुसार, किसी राजनीतिक दल की संगठनात्मक संरचना के आधार पर उसके संविधान को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

    जनता दल और एसआर बोम्मई मामले का हवाला

    सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने 1994 के जनता दल से जुड़े घटनाक्रम का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कई राजनीतिक दलों में फूट के मामले सामने आए हैं और प्रत्येक मामले में कुछ समानताएं देखने को मिलती हैं।

    उन्होंने एस.आर. बोम्मई मामले का भी संदर्भ दिया।

    सिब्बल ने दावा किया कि चुनाव आयोग ने जनता दल से जुड़े पुराने फैसले का हवाला दिया, लेकिन उनके मुताबिक वह उदाहरण शिवसेना मामले पर उसी तरह लागू नहीं होता।

    ‘शिंदे ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाई’

    कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि एकनाथ शिंदे गुट ने अपनी अलग राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाई।

    उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल का संचालन उसके संविधान के अनुसार होना चाहिए और चुनाव आयोग को पार्टी के संविधान के अनुसार चुनाव कराने का निर्देश देने का अधिकार हो सकता है, लेकिन पार्टी या चुनाव चिन्ह किसे दिया जाए, यह सवाल अलग है।

    कोर्ट ने कहा- ‘संवैधानिक संस्थाओं को कमतर न आंकें’

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

    जब कपिल सिब्बल ने संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाए तो कोर्ट ने कहा कि अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमतर नहीं आंकना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि अन्य संवैधानिक संस्थाएं भी अपना काम कर रही हैं और लोकतंत्र की जिम्मेदारी सामूहिक है।

    ‘लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी हमारे कंधों पर’

    कपिल सिब्बल ने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट के कंधों पर है, क्योंकि न्यायालय इस मामले में फैसला देने वाला है।

    इस पर कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

    सिब्बल ने जोर देकर कहा कि यह मामला केवल शिवसेना तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है।

    ‘किसी भी गुट को पार्टी मान लिया गया तो स्थिति विनाशकारी होगी’

    सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने एक गंभीर चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि यदि किसी विधिमंडल दल का एक गुट अलग होकर खुद को राजनीतिक दल बताता है और चुनाव आयोग के पास जाकर मान्यता हासिल कर लेता है, तो ऐसी व्यवस्था भविष्य में बेहद गंभीर और विनाशकारी स्थिति पैदा कर सकती है।

    उन्होंने इसे केवल शिवसेना का मामला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल बताया।

    आगे क्या होगा?

    सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के चुनाव चिन्ह और आमदारों की अयोग्यता से जुड़े मामले पर सुनवाई जारी है। 13 अगस्त 2026 को कपिल सिब्बल अपनी दलीलें पूरी करने वाले हैं, जिसके बाद ठाकरे गुट की ओर से अन्य वरिष्ठ वकीलों की दलीलें भी सामने आने की संभावना है।

    फिलहाल कोर्ट के सामने मुख्य सवालों में चुनाव आयोग के अधिकार, शिवसेना के चुनाव चिन्ह के आवंटन की प्रक्रिया और आमदारों की अयोग्यता से जुड़े संवैधानिक पहलू शामिल हैं।

    शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह विवाद में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले और उसके अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पार्टी में फूट, चुनाव चिन्ह और आमदारों की अयोग्यता अलग-अलग मुद्दे हैं। सिब्बल ने अनुच्छेद 29A, चुनाव आयोग की प्रक्रिया, नोटिस और पुराने जनता दल मामले का हवाला देते हुए अपनी दलीलें रखीं। कोर्ट ने भी संवैधानिक संस्थाओं को कमतर नहीं आंकने की टिप्पणी की। मामले में आगे की सुनवाई पर पूरे महाराष्ट्र और देश की नजर बनी हुई है।

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