जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत नजरबंदी अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंच गई है। उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने कोर्ट में याचिका दाखिल की है, जिसमें सोनम वांगचुक की रिहाई और उनके अधिकारों की रक्षा की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र, केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख और जोधपुर सेंट्रल जेल के एसपी को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इन अधिकारियों से मामले पर जवाब दाखिल करने को कहा है और सोनम वांगचुक की रिहाई को लेकर आवश्यक जानकारी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
गीतांजलि अंगमो की याचिका में आरोप लगाया गया है कि सोनम वांगचुक को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत नजरबंद किया गया है। याचिका में कहा गया है कि उनकी नजरबंदी न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है, बल्कि उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है।
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने अधिकारियों से पूछा कि किस आधार पर सोनम वांगचुक को एनएसए के तहत नजरबंद किया गया है और क्या सभी कानूनी प्रावधानों का पालन किया गया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति की नजरबंदी केवल कानूनी प्रक्रिया के तहत और उचित कारणों से ही हो सकती है।
इस मामले ने देशभर में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। कई मानवाधिकार संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सोनम वांगचुक की रिहाई और एनएसए के दुरुपयोग की संभावना पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि एनएसए जैसी कठोर धाराओं का इस्तेमाल केवल राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित गंभीर मामलों में होना चाहिए, न कि शांतिपूर्ण जलवायु और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर।
लद्दाख प्रशासन ने याचिका के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जोधपुर सेंट्रल जेल के अधिकारियों को भी कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किया गया है, ताकि वे सोनम वांगचुक की वर्तमान स्थिति और जेल में उनके साथ हो रही देखभाल की जानकारी पेश कर सकें।
विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई भारतीय न्यायिक प्रणाली की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का प्रतीक है। कोर्ट की निगरानी में यह मामला कानूनी प्रक्रिया के अनुसार हल किया जाएगा और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन न हो।
मामले की सुनवाई ने यह सवाल भी उठाया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का इस्तेमाल किस हद तक किया जा सकता है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि एनएसए का दुरुपयोग किसी भी लोकतांत्रिक समाज में गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में नोटिस जारी करना इस बात का संकेत है कि अदालत गंभीरता से यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कानून का इस्तेमाल न्यायसंगत और उचित तरीके से हो।
गीतांजलि अंगमो ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वह न्याय की पूरी प्रक्रिया में विश्वास रखती हैं और आशा करती हैं कि सुप्रीम कोर्ट सोनम वांगचुक की रिहाई सुनिश्चित करेगा। उन्होंने कहा कि उनके पति केवल जलवायु और सामाजिक कार्यों में सक्रिय थे और उनका किसी भी प्रकार से राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने का इरादा नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट की नोटिस जारी करने के बाद अब सभी पक्षों से जवाब आने के बाद अगली सुनवाई में मामला विस्तृत रूप से सुना जाएगा। अदालत यह तय करेगी कि क्या सोनम वांगचुक की नजरबंदी कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप थी या नहीं।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई का सवाल नहीं है, बल्कि यह नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और कानून के उचित उपयोग पर भी एक महत्वपूर्ण बहस खड़ी करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इस मामले का हल न केवल सोनम वांगचुक के लिए, बल्कि देश में सभी नागरिकों के अधिकारों और न्यायिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।







