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  • भारत को स्वयं के लिए बनाना होगा मज़बूत बुनियादी ढांचा: वैश्विक उथल-पुथल के बीच बोले विदेश मंत्री एस. जयशंकर

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    वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य और बढ़ती अस्थिरता के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत को न केवल क्षेत्रीय संकटों के समाधान में एक भरोसेमंद साझेदार बनना होगा, बल्कि उसे अपने लिए एक सशक्त और टिकाऊ बुनियादी ढांचा (infrastructure) तैयार करने की दिशा में भी निर्णायक कदम उठाने होंगे। जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि “भारत को स्वयं पर भरोसा करना होगा और सहयोग की ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी, जो किसी भी वैश्विक चुनौती का सामना करने में सक्षम हो।”

    जयशंकर ने यह बात एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर कही, जहां उन्होंने दुनिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में दुनिया तेजी से बदल रही है। शक्तियों का संतुलन बार-बार पुनर्निर्धारित हो रहा है और ऐसे में भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए रणनीतिक रूप से तैयार रहना होगा। उन्होंने कहा कि “आज वैश्विक व्यवस्था पुनर्गठन के दौर से गुजर रही है। हर देश अपनी स्थिति को मज़बूत करने में लगा है, ऐसे में भारत को अपनी क्षमताओं पर निर्भर रहते हुए आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।”

    उन्होंने जोर देकर कहा कि उपमहाद्वीप में किसी भी संकट के समय भारत को “भरोसेमंद विकल्प” बनना चाहिए। इसका मतलब केवल सैन्य या राजनीतिक नेतृत्व नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और मानव संसाधन क्षमताओं में भी भारत को आगे बढ़ना है। जयशंकर ने कहा कि यदि भारत को अपने पड़ोसी देशों और क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए एक स्थिर विकल्प बनना है, तो उसे व्यापार, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग के मोर्चों पर भी आत्मनिर्भर होना पड़ेगा।

    उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (supply chains) में आई बाधाओं और भू-राजनीतिक तनावों ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी देश को केवल दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने न केवल अपनी जरूरतें पूरी कीं, बल्कि दुनिया को वैक्सीन और दवाइयों की आपूर्ति कर “वैश्विक भरोसेमंद साझेदार” की भूमिका निभाई। जयशंकर ने कहा कि यही आत्मनिर्भरता और रणनीतिक क्षमता अब भारत के हर क्षेत्र में दिखाई देनी चाहिए — चाहे वह रक्षा उत्पादन हो, तकनीकी नवाचार हो या अंतरराष्ट्रीय व्यापार।

    विदेश मंत्री ने कहा कि भारत को अपनी नीतियों में दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि “हमें केवल तत्काल समस्याओं पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान पर ध्यान देना होगा। वैश्विक राजनीति में परिवर्तन तेज़ी से हो रहा है, और हमें उसी गति से अपनी योजनाओं को अनुकूल बनाना होगा।” जयशंकर ने यह भी बताया कि भारत का उद्देश्य केवल अपने लिए विकास करना नहीं, बल्कि अपने पड़ोसी देशों को भी विकास के मार्ग पर सहयोग देना है।

    उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय स्थिरता तभी संभव है जब भारत मजबूत होगा। इसलिए भारत को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, निवेश और नीति ढांचे को इस तरह से विकसित करना होगा कि वह दक्षिण एशिया में आर्थिक नेतृत्व का केंद्र बन सके। जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और “नेबरहुड फर्स्ट” नीति को मजबूत बुनियादी ढांचे के माध्यम से ही प्रभावी बनाया जा सकता है।

    जयशंकर ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में कहा कि दुनिया में अब सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। ऐसे में भारत को यह समझना होगा कि कब किसके साथ सहयोग करना है और कब अपने हितों को प्राथमिकता देनी है। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य यही है कि देश अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए दुनिया में एक संतुलित भूमिका निभाए।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत आज एक “पोलिसी शपर (policy shaper)” देश बन चुका है। अब भारत केवल अंतरराष्ट्रीय निर्णयों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि उन निर्णयों को आकार देने वाला राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि “भारत की बात आज वैश्विक मंचों पर सुनी जाती है। लेकिन इस प्रभाव को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए हमें आर्थिक शक्ति, तकनीकी दक्षता और कूटनीतिक लचीलापन बढ़ाना होगा।”

    जयशंकर के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने भारत की विदेश नीति की नई दिशा के रूप में देखा है। उनका कहना है कि भारत अब “रिएक्टिव” (प्रतिक्रियात्मक) नहीं, बल्कि “प्रोएक्टिव” (सक्रिय) रणनीति अपना रहा है। इस नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत हर संकट की स्थिति में समाधान का हिस्सा बने, समस्या का नहीं।

    विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि भारत को अपनी संस्थाओं को सशक्त करना होगा और नीतिगत स्थिरता बनाए रखनी होगी। उन्होंने बताया कि आने वाले वर्षों में भारत के लिए “बुनियादी ढांचे में आत्मनिर्भरता” केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता बन जाएगी। उन्होंने कहा कि भारत को अपने बंदरगाह, सड़क, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी के नेटवर्क को ऐसे स्तर पर ले जाना होगा कि वे न केवल देश के भीतर बल्कि पड़ोसी देशों के साथ भी विकास का सेतु बन सकें।

    अंत में जयशंकर ने कहा कि वैश्विक अस्थिरता भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। भारत को इस अवसर का उपयोग अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए। उन्होंने कहा, “भारत को केवल वैश्विक शक्ति बनने का सपना नहीं देखना चाहिए, बल्कि उस दिशा में ठोस कदम भी उठाने चाहिए। आत्मनिर्भरता, रणनीतिक सोच और विश्वसनीय सहयोग के आधार पर ही भारत आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभा सकेगा।”

    जयशंकर का यह बयान न केवल भारत की विदेश नीति का सार प्रस्तुत करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि आने वाले दशक में भारत का ध्यान अब विकासशील राष्ट्र से आगे बढ़कर एक वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी पहचान मजबूत करने पर रहेगा।

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