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  • यूपी पंचायत चुनाव 2026: इस बार भी पुराना OBC आरक्षण फार्मूला लागू, 2021 की तर्ज पर तय होंगी सीटें

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    उत्तर प्रदेश में 2026 के पंचायत चुनाव को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और इस बार भी सरकार पुराने OBC आरक्षण फार्मूले के तहत चुनाव करवाने की योजना बना रही है। चर्चाओं के अनुसार, राज्य सरकार 2021 के पंचायत चुनाव में तय आरक्षण फॉर्मूले को ही आधार बनाकर सीटों का बंटवारा करेगी। यह फैसला तब तक के लिए माना जा रहा है जब तक केंद्र सरकार की जातीय जनगणना रिपोर्ट सामने नहीं आती और उस पर आधारित नया आरक्षण फार्मूला तैयार नहीं हो जाता।

    जानकारी के मुताबिक, पंचायती राज विभाग ने आरक्षण प्रक्रिया को लेकर प्रारंभिक तैयारियां शुरू कर दी हैं। जिलों से पुराने आरक्षण डेटा को अपडेट करने का निर्देश भी जारी कर दिया गया है। फिलहाल सरकार का रुख साफ है कि जब तक जातीय जनगणना की रिपोर्ट नहीं मिलती, तब तक पुराने आरक्षण पैटर्न में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।

    2021 में लागू फार्मूला क्या था?
    साल 2021 के पंचायत चुनाव में सरकार ने रोटेशन प्रणाली के तहत आरक्षण तय किया था। इसके अनुसार, पिछड़ी जातियों (OBC), अनुसूचित जातियों (SC) और महिलाओं के लिए सीटें पिछले चक्र की तुलना में घुमाई गई थीं। उस समय राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद ‘त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था’ में आरक्षण तय करने के लिए जनसंख्या के अनुपात को ध्यान में रखते हुए सीटों का बंटवारा किया था। इसी फार्मूले को अब 2026 के चुनाव में भी लागू किया जा सकता है।

    जातीय जनगणना से बदलेगा भविष्य का फार्मूला
    केंद्र सरकार ने हाल ही में जातीय जनगणना को लेकर महत्वपूर्ण फैसला लिया है। इस रिपोर्ट के आने के बाद ही राज्यों में आरक्षण के अनुपात को नई जनसंख्या के आधार पर संशोधित किया जा सकेगा। चूंकि रिपोर्ट फिलहाल तैयार नहीं है, इसलिए यूपी सरकार के पास पुराना फार्मूला लागू करने के अलावा कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है। सूत्रों के अनुसार, जातीय जनगणना रिपोर्ट 2026 की शुरुआत में पेश होने की संभावना है, लेकिन तब तक पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

    इसलिए, माना जा रहा है कि 2026 के पंचायत चुनाव पुराने OBC आरक्षण फॉर्मूले पर ही होंगे और नया फार्मूला संभवतः 2031 के चुनावों से लागू किया जाएगा।

    राजनीतिक हलचल तेज
    इस बीच, विपक्षी दलों ने इस निर्णय पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकार जातीय जनगणना को जानबूझकर विलंबित कर रही है ताकि OBC वर्गों के वास्तविक प्रतिनिधित्व को दबाया जा सके। विपक्ष का कहना है कि नई जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य में किन वर्गों की संख्या बढ़ी है और किसे अधिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है।

    वहीं, सत्तारूढ़ दल का तर्क है कि 2021 का आरक्षण फार्मूला कानूनी रूप से वैध है और जब तक नई रिपोर्ट आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं की जाती, तब तक उसमें बदलाव करना कानूनी विवाद को जन्म दे सकता है। सरकार का कहना है कि पंचायत चुनावों को समय पर और पारदर्शिता के साथ कराना प्राथमिकता है।

    प्रशासनिक स्तर पर तैयारी शुरू
    राज्य निर्वाचन आयोग और पंचायती राज विभाग के बीच लगातार बैठकों का दौर जारी है। जिलों से पंचायत सीटों का पुन: परीक्षण कराया जा रहा है ताकि पिछले चुनाव के दौरान हुए किसी भी विवाद या त्रुटि को इस बार सुधारा जा सके। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि आरक्षण सूची के प्रकाशन से पहले स्थानीय स्तर पर आपत्तियां आमंत्रित की जाएं ताकि बाद में कोई विवाद न रहे।

    ग्रामीण विकास पर असर
    पंचायत चुनाव केवल सत्ता संतुलन का प्रश्न नहीं हैं बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन से भी सीधे जुड़े हैं। ग्राम प्रधानों और जिला पंचायत सदस्यों के चयन से ही कई सरकारी योजनाओं की दिशा तय होती है। ऐसे में आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का प्रतीक भी है।

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