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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में विपक्षी महागठबंधन के लिए समूचा माहौल निराशाजनक रहा, लेकिन उस गठबंधन का सबसे छोटा सदस्य—इंडियन इनक्लूसिव पार्टी (IIP)—अपने नेता आईपी गुप्ता के ज़रिए एक बड़ी राजनीतिक छाप छोड़ने में कामयाब रहा है। 55 वर्षीय आईपी गुप्ता ने सहरसा विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कड़े प्रतिद्वंद्वी को पराजित करते हुए महागठबंधन को एक अनमोल सफलता दिलाई है। इस जीत ने न केवल उनकी पार्टी को मान्यता दी है, बल्कि बिहार की राजनीतिक रणनीति में एक नए दृष्टिकोण की संभावना भी जगाई है।
आईपी गुप्ता की पृष्ठभूमि और उनकी पार्टी की नींव ही उनकी पहचान का मूल है। पान (तांती-तत्वा) समुदाय से आने वाले गुप्ता ने अपनी इंडियन इनक्लूसिव पार्टी की स्थापना सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और पिछड़े समुदायों के राजनीतिक सशक्तिकरण की सोच के साथ की थी। IIP महागठबंधन में शामिल होकर तीन सीटों का दावा करती थी, और सहरसा उनकी लड़ाई का प्रमुख मैदान था।
चुनाव नतीजों में गुप्ता ने बीजेपी के उम्मीदवार आलोक रंजन झा को करीब दो हज़ार वोटों के अंतर से मात दी। उनका यह उलटफेर अब विवादित सियासी परिदृश्य में एक चौंकाने वाला मोड़ बन गया है, क्योंकि उनकी पार्टी अभी बहुत नई है और संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने बड़े दलों के सामने अपनी ताकत दिखाई है।
गुप्ता ने जीत के बाद जनता का आभार व्यक्त किया है और भरोसा जताया है कि वे सहरसा के अपने प्रतिनिधि के रूप में न सिर्फ चुनावी वायदों को पूरा करेंगे, बल्कि क्षेत्र के विकास एवं सामाजिक न्याय पर विशेष ध्यान देंगे। उनकी पार्टी का एजेंडा स्पष्ट रहा है: पान-समाज, विशेषकर तांती-तत्वा समुदाय, जिसे बिहार की राजनीति में पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिली, वह उनकी राजनीतिक पहचान का केंद्र है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, आईपी गुप्ता की जीत महागठबंधन के लिए सिर्फ एक सीट जीतना नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि बिहार में छोटे दलों की गहराई और उनकी जातिगत-समाजिक आधार शक्ति अब भी मायने रखती है। महागठबंधन के लिए यह जीत नॉ मोरल बूस्ट है क्योंकि अन्य बड़े घटकों ने अपेक्षित प्रदर्शन नहीं दिखाया, और वहीं IIP ने एक रणनीतिक, नीच-लेवल आधार बनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
गुप्ता का राजनीतिक सफर भी दिलचस्प है। इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आने वाले उन्होंने पहले कांग्रेस में अपनी राजनीतिक गतिविधि की शुरुआत की थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पार्टी बना कर एक स्पष्ट सामाजिक उद्देश्य के साथ विधानसभा चुनावों में उतरने का निर्णय लिया। उनकी नई पार्टी का गठन पैन समाज को संगठित करने की सोच पर आधारित था, और उनकी यह रणनीति इस जीत के जरिए सफल साबित हुई है।
अब उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है। जनता की उम्मीदें उन पर हैं कि वे सिर्फ एक विधायक नहीं, बल्कि हाशिए पर रहे समुदायों की आवाज़ बनकर काम करें। उनकी जीत यह संदेश देती है कि बिहार की राजनीति में सिर्फ बड़े नाम ही नहीं, बल्कि समावेशी सोच और स्थानीय जुड़ाव भी निर्णायक हो सकते हैं।
इंडियन इनक्लूसिव पार्टी की यह सफलता भविष्य के लिए संभावनाओं का द्वार खोलती है। अगर छोटे दल सही दिशा, मजबूत संगठन और सामाजिक आधार के साथ काम करें, तो वे न केवल अपनी आवाज़ उठा सकते हैं, बल्कि बड़े राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण बदलाव भी ला सकते हैं। आईपी गुप्ता की इस विजय ने यह साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में बदलाव सिर्फ बड़े मंचों तक सीमित नहीं है — नीचे से उठते सामाजिक आंदोलनों और समावेशी विचारों का असर भी अब स्पष्ट दिख रहा है।
महागठबंधन के लिए यह जीत उत्साह का स्रोत है और IIP के लिए यह शुरुआत मात्र एक जीत की नहीं, बल्कि पहचान, भरोसे और नए राजनीतिक भविष्य की नींव है। बिहार की वोटिंग मशीन में छोटे दलों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है, और आईपी गुप्ता की यह जीत सियासी मानचित्र पर उनकी पार्टी की नई उड़ान की घोषणा करती है।








