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  • नासिक में साधुग्राम विस्तार पर बढ़ा विवाद: 1,700 पेड़ों की कटाई के विरोध में पर्यावरणवादियों का मोर्चा

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    नासिक नगर निगम (NMC) की ओर से साधुग्राम विस्तार परियोजना के लिए 1,700 पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव पूरे शहर में विवाद का विषय बन गया है। आगामी सिम्हस्थ कुंभ मेला (2026–2028) की तैयारी के तहत तपोवन क्षेत्र में साधु-संतों के लिए अतिरिक्त स्थान विकसित करने की योजना बनाई गई है। लेकिन इस योजना से पर्यावरण को संभावित नुकसान को देखते हुए पर्यावरणविद और कई स्थानीय नागरिक आक्रोश में हैं।

    परियोजना में शामिल पेड़ों की पहचान और उनकी प्रजातियों को लेकर नगर निगम की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण के बाद भी लोगों की नाराज़गी कम नहीं हुई है। स्थानीय पर्यावरण दूत राजू देसले के नेतृत्व में नागरिकों ने पेड़ों को गले लगाकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया, जो चिपको आंदोलन की याद दिलाता है। उनका कहना है कि नासिक की हरियाली केवल सौंदर्य का हिस्सा नहीं, बल्कि शहर के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण धरोहर है।

    निगम का दावा है कि सूचीबद्ध 1,825 में से केवल 10 वर्ष से कम आयु के पेड़ों को ही काटा जाएगा। इनमें ज्यादातर बबूल (Acacia) और कशिद (Cassia fistula) जैसे गैर-फिकस पेड़ हैं, जिन्हें हटाया जाना जरूरी बताया जा रहा है। वहीं पीपल, बरगद और अन्य फिकस प्रजातियों के पुराने पेड़ों को संरक्षित रखने की बात कही गई है। निगम का कहना है कि कुंभ मेले जैसी विशाल धार्मिक परंपरा के लिए जगह उपलब्ध कराना आवश्यक है और यह विकास योजना शहर के हित में है।

    इसके बावजूद, नागरिकों की आपत्तियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब तक 200 से अधिक औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। स्थानीय लोगों की मांग है कि सार्वजनिक सुनवाई को पारदर्शी तरीके से किसी खुले स्थान पर आयोजित किया जाए, ताकि हर नागरिक अपनी बात रख सके। कई पर्यावरण समूहों का कहना है कि नासिक “ग्रीन कुंभ” के नाम से अपनी पहचान बना रहा है, ऐसे में इतनी बड़ी मात्रा में पेड़ों की कटाई इस छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।

    पर्यावरणविदों की राय है कि विकास को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसके लिए पेड़ काटना जरूरी भी नहीं है। उनका कहना है कि साधुग्राम विस्तार के लिए वैकल्पिक स्थानों का चयन किया जा सकता है, या ऐसी डिजाइन तैयार की जा सकती है, जिसमें पेड़ों को संरक्षित रखते हुए इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हो। कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि अगर पेड़ों की कटाई आवश्यक भी हो, तो उनका वैज्ञानिक और पारदर्शी मूल्यांकन किया जाए।

    NMC की अतिरिक्त आयुक्त करिश्मा नैर ने आश्वासन दिया है कि पुराने पेड़ों को काटने का कोई इरादा नहीं है और पेड़ बचाना निगम की प्राथमिकता में शामिल है। NMC के गार्डन विभाग और ट्री अथॉरिटी ने एक “ट्री एक्शन प्लान” भी तैयार किया है, जिसके अनुसार हर कटे हुए पेड़ के स्थान पर उसकी उम्र के अनुपात से अधिक पौधे लगाए जाएंगे।

    इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि अंतिम निर्णय जनता की राय को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा। लेकिन पर्यावरण और विकास के बीच यह टकराव नासिक के भविष्य की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।

    यह विवाद सिर्फ पेड़ों की सुरक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि शहर की पहचान, पर्यावरण संतुलन और प्रशासन की पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बना हुआ है। नासिकवासियों का मानना है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाकर ही शहर एक टिकाऊ और स्वस्थ भविष्य की ओर बढ़ सकता है।

    नासिक में साधुग्राम विस्तार योजना पर चल रहा यह संघर्ष बताता है कि आज की दुनिया में विकास का अर्थ केवल निर्माण नहीं, बल्कि पर्यावरण की रक्षा और नागरिकों की आवाज़ को महत्व देना भी है। यह लड़ाई न केवल पेड़ों की है, बल्कि यह तय करेगी कि नासिक शहर आने वाले वर्षों में किस दिशा में आगे बढ़ेगा—प्रकृति के साथ या उसके खिलाफ।

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