देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन फ्रॉड के मामलों को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। आरबीआई ने प्रस्ताव दिया है कि यदि कोई ग्राहक ₹10,000 से अधिक का ऑनलाइन ट्रांसफर करता है, तो उस ट्रांजैक्शन को पूरा होने से पहले एक घंटे का ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ दिया जा सकता है।
इस प्रस्ताव का उद्देश्य साइबर अपराधियों द्वारा लोगों से तुरंत पैसे ट्रांसफर करवाने वाले मामलों पर रोक लगाना है। हालांकि बैंकिंग सेक्टर ने इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन इसके व्यावहारिक असर और ग्राहकों की सुविधा को लेकर कई सवाल भी उठाए हैं।
₹10,000 से अधिक के ट्रांसफर पर एक घंटे की देरी
आरबीआई ने अप्रैल 2026 में जारी अपने चर्चा पत्र (Discussion Paper) में सुझाव दिया था कि व्यक्तिगत ग्राहकों, प्रोपराइटर और पार्टनरशिप फर्मों द्वारा किए जाने वाले ₹10,000 से अधिक के डिजिटल भुगतान पर एक घंटे का कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू किया जाए।
यह देरी केवल पैसे भेजने वाले (Payer) के स्तर पर लागू होगी। इस दौरान यदि ग्राहक को लगे कि वह किसी धोखाधड़ी का शिकार हो रहा है, तो वह ट्रांजैक्शन रोक सकेगा।
आरबीआई का मानना है कि इससे ऑथराइज्ड पुश पेमेंट (APP) फ्रॉड जैसे मामलों में बड़ी कमी आएगी।
बैंकों ने किया समर्थन, लेकिन जताई चिंता
बैंकिंग उद्योग का मानना है कि यह नियम ऑनलाइन फ्रॉड रोकने में मददगार साबित होगा। हालांकि, बैंकों का कहना है कि इसे हर प्रकार के ट्रांजैक्शन पर समान रूप से लागू करना उचित नहीं होगा।
उदाहरण के तौर पर यदि कोई ग्राहक किसी दुकान से ₹15,000 या ₹20,000 का मोबाइल फोन खरीद रहा है, तो उसे भुगतान क्लियर होने के लिए एक घंटे तक इंतजार करना पड़ सकता है, जिससे ग्राहकों और व्यापारियों दोनों को परेशानी होगी।
बैंकों ने सुझाव दिया है कि नियमों में कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए लचीलापन रखा जाए।
बुजुर्गों के लिए ‘ट्रस्टेड पर्सन’ की व्यवस्था
आरबीआई ने वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए भी नया प्रस्ताव रखा है।
इसके तहत 70 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग ग्राहकों द्वारा किए जाने वाले ₹50,000 से अधिक के डिजिटल ट्रांजैक्शन के लिए पहले से नामित एक ‘ट्रस्टेड पर्सन’ की मंजूरी आवश्यक हो सकती है।
यदि भविष्य में यह भरोसेमंद व्यक्ति बदला जाता है, तो नए व्यक्ति को जोड़ने के बाद 24 घंटे का कूलिंग-ऑफ पीरियड भी लागू होगा।
आपातकालीन भुगतान में आ सकती है दिक्कत
बैंकों ने इस व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि इससे बुजुर्गों को साइबर ठगी से सुरक्षा मिलेगी।
हालांकि उन्होंने यह भी चिंता जताई कि यदि कोई बुजुर्ग अस्पताल, मेडिकल स्टोर या अन्य आपात स्थिति में भुगतान करना चाहता है और उसका ट्रस्टेड पर्सन उपलब्ध नहीं है, तो जरूरी भुगतान में अनावश्यक देरी हो सकती है।
सिस्टम बदलने में आएगा भारी खर्च
आरबीआई के इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए बैंकों को अपने मौजूदा डिजिटल पेमेंट सिस्टम में बड़े तकनीकी बदलाव करने होंगे।
इसके लिए—
- नई ट्रांजैक्शन कतार (Queue) बनानी होगी।
- कूलिंग-ऑफ अवधि के दौरान ट्रांजैक्शन रद्द करने की सुविधा विकसित करनी होगी।
- सेटलमेंट सिस्टम में बदलाव करने होंगे।
- पूरे पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को नए सिरे से अपडेट करना होगा।
बैंकिंग अधिकारियों का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में भारी निवेश की आवश्यकता होगी।
यूपीआई पर पहले से वित्तीय दबाव
बैंक पहले ही यूपीआई (UPI) पर जीरो मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नीति के कारण आर्थिक दबाव झेल रहे हैं।
बैंकों के अनुसार देश के डिजिटल पेमेंट सिस्टम को बनाए रखने और उसका विस्तार करने के लिए हर वर्ष लगभग ₹10,000 करोड़ का निवेश करना पड़ता है, जिसका बड़ा हिस्सा बैंक और पेमेंट सेवा प्रदाता स्वयं वहन करते हैं।
अंतिम फैसला अभी बाकी
आरबीआई ने फिलहाल इस प्रस्ताव पर सभी संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे हैं। बैंकिंग उद्योग को उम्मीद है कि अंतिम दिशा-निर्देश तैयार करते समय डिजिटल सुरक्षा के साथ-साथ आम ग्राहकों की सुविधा, आपातकालीन जरूरतों और तकनीकी व्यवहार्यता का भी संतुलन बनाया जाएगा।
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र में यह अब तक का सबसे बड़ा सुरक्षा सुधार माना जाएगा।








