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  • ‘सतलुज’ विवाद: क्या दिलजीत दोसांझ की फिल्म ने आतंकवाद का महिमामंडन किया या उठाए मानवाधिकार के सवाल?

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    अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ इन दिनों देशभर में चर्चा और विवाद का विषय बनी हुई है। पहले ‘पंजाब 95’ नाम से चर्चित इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की आपत्तियों और कई संशोधनों की सिफारिशों के बाद नया नाम देकर OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया। हालांकि, बाद में फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। इसके बावजूद फिल्म को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही है।

    विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

    फिल्म का निर्माण पिछले तीन वर्षों से विवादों में रहा। CBFC ने पहले इसके शीर्षक और कई दृश्यों पर आपत्ति जताई थी तथा अनेक कट लगाने की सिफारिश की थी। बाद में मामला न्यायिक और पुनरीक्षण प्रक्रिया तक पहुंचा। आरोप है कि फिल्म को सुझाए गए सभी बदलावों के बिना ही ‘सतलुज’ नाम से OTT पर रिलीज कर दिया गया, जिसके बाद इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

    फिल्म की कहानी किस पर आधारित है?

    फिल्म एक मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और संघर्ष से प्रेरित बताई जाती है। कहानी पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों, लापता लोगों और अज्ञात शवों के मामलों की जांच के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने मुख्य भूमिका निभाई है।

    विवाद की वजह क्या है?

    फिल्म को लेकर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

    एक पक्ष का कहना है कि फिल्म मानवाधिकार उल्लंघनों और न्याय की मांग जैसे संवेदनशील मुद्दों को सामने लाने का प्रयास करती है। वहीं दूसरे पक्ष का आरोप है कि फिल्म में घटनाओं को एकतरफा ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिससे पंजाब पुलिस की भूमिका पर सवाल उठते हैं और आतंकवाद के खिलाफ चले अभियानों की पृष्ठभूमि पर्याप्त रूप से नहीं दिखाई गई।

    कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि फिल्म में ऐसे संवाद और दृश्य हैं, जिन्हें अलगाववादी विचारधारा को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने वाला माना जा सकता है। हालांकि, फिल्म निर्माताओं की ओर से इन आरोपों पर अलग दृष्टिकोण रखा गया है।

    क्या फिल्म में आतंकवाद का महिमामंडन किया गया है?

    यह सवाल फिलहाल सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। फिल्म के विरोधियों का दावा है कि इसमें सुरक्षा बलों की कार्रवाई को कठघरे में खड़ा किया गया है, जबकि पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ हुए संघर्ष का पूरा संदर्भ नहीं दिखाया गया। दूसरी ओर, फिल्म के समर्थकों का कहना है कि यह एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की कहानी है और इसका उद्देश्य कथित मानवाधिकार उल्लंघनों पर चर्चा करना है, न कि किसी भी प्रकार के आतंकवाद का समर्थन करना।

    फिल्म में दिखाए गए घटनाक्रम और संवादों की व्याख्या दर्शकों, समीक्षकों और विभिन्न संगठनों द्वारा अलग-अलग तरीके से की जा रही है। इसलिए यह कहना कि फिल्म निश्चित रूप से किसी एक पक्ष का समर्थन करती है, एक व्याख्यात्मक निष्कर्ष होगा, न कि स्थापित तथ्य।

    दिलजीत दोसांझ के अभिनय की सराहना

    विवादों के बीच भी फिल्म में दिलजीत दोसांझ के अभिनय की व्यापक सराहना हो रही है। समीक्षकों के अनुसार उन्होंने मुख्य किरदार को गंभीरता और प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतारा है। फिल्म में अर्जुन रामपाल, गीतिका, कंवलजीत सिंह और सुविंदर विक्की के अभिनय को भी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।

    फिलहाल क्या स्थिति है?

    फिल्म को भारत में OTT प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया है और इसे लेकर कानूनी व नियामकीय प्रक्रियाएं जारी हैं। विभिन्न पक्षों की ओर से फिल्म की सामग्री, रिलीज प्रक्रिया और कथित नियमों के उल्लंघन को लेकर सवाल उठाए गए हैं। मामले में अंतिम स्थिति संबंधित अधिकारियों और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।

    नोट: फिल्म को लेकर लगाए गए आरोप, समर्थन और आलोचनाएं विभिन्न पक्षों के दावे हैं। इन पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच, कानूनी प्रक्रिया और आधिकारिक निर्णयों के बाद ही माना जाएगा।

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