सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद की सुनवाई के दौरान मंगलवार को ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जोरदार दलीलें पेश कीं। उन्होंने एकनाथ शिंदे की ‘मुख्य नेता’ के तौर पर नियुक्ति से लेकर चुनाव आयोग के अधिकारों और शिवसेना के पार्टी संविधान से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल अदालत के सामने रखे।
सिब्बल के तर्कों के बाद ठाकरे गुट के नेताओं का आत्मविश्वास बढ़ा है। सुनवाई समाप्त होने के बाद शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेता संजय राऊत ने कहा कि वे सुनवाई से संतुष्ट हैं और उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है।
यह मामला वर्ष 2023 में चुनाव आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को वास्तविक शिवसेना के रूप में मान्यता देने और पार्टी का ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह आवंटित करने के फैसले से जुड़ा है। उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
कपिल सिब्बल ने शिंदे की ‘मुख्य नेता’ नियुक्ति पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने एकनाथ शिंदे की पार्टी में ‘मुख्य नेता’ के पद को लेकर सवाल उठाया।
उन्होंने दलील दी कि शिवसेना के 1999 के पार्टी संविधान में ‘मुख्य नेता’ नाम के किसी पद का उल्लेख नहीं है। पार्टी के संविधान में ‘पक्षप्रमुख’ यानी पार्टी प्रमुख के पद का उल्लेख किया गया है।
सिब्बल ने सवाल उठाया कि जब पार्टी के मूल संविधान में ‘मुख्य नेता’ पद का प्रावधान नहीं है, तो एकनाथ शिंदे खुद को इस पद पर किस आधार पर स्थापित करते हैं।
उन्होंने शिंदे की नियुक्ति को वर्ष 2018 में किए गए पार्टी संविधान संशोधन से भी जोड़कर सवाल उठाया।
2018 के संविधान संशोधन को लेकर भी सवाल
कपिल सिब्बल ने अदालत में तर्क दिया कि शिंदे गुट की ओर से 2018 के पार्टी संविधान संशोधन को संवैधानिक नहीं माना जाता।
ऐसे में सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि उसी संविधान संशोधन को असंवैधानिक या मान्य नहीं माना जाता है, तो उसी संशोधन के आधार पर शिंदे की नियुक्ति को वैध कैसे माना जा सकता है?
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पार्टी में शामिल होने के बाद उसके लाभ लेने और बाद में उसी पार्टी की आंतरिक व्यवस्था को लोकतांत्रिक नहीं बताने के दावे पर भी सवाल उठता है।
चुनाव आयोग के अधिकारों पर कपिल सिब्बल की दलील
कपिल सिब्बल का दूसरा प्रमुख तर्क चुनाव आयोग द्वारा शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह को शिंदे गुट को दिए जाने के फैसले को लेकर था।
सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग इस तरह के विवाद में लवाद की तरह काम करता है, लेकिन पार्टी के भीतर हुई राजनीतिक फूट को तय करने का अधिकार उसकी सीमाओं से जुड़ा प्रश्न है।
उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक दल का संविधान संवैधानिक है या असंवैधानिक, इसका अंतिम निर्धारण चुनाव आयोग नहीं कर सकता।
राजनीतिक दल और विधिमंडल दल अलग-अलग
सिब्बल ने सुनवाई के दौरान राजनीतिक दल और विधिमंडल दल के बीच अंतर पर भी जोर दिया।
उनके मुताबिक, शिवसेना में जो विभाजन हुआ, वह मुख्य रूप से विधिमंडल दल के स्तर पर हुआ था, राजनीतिक दल के स्तर पर नहीं।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल और विधिमंडल दल को एक समान नहीं माना जा सकता।
इसके बावजूद चुनाव आयोग ने शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह को शिंदे गुट को देने के फैसले में विधिमंडल दल के बहुमत को महत्वपूर्ण आधार बनाया।
विधिमंडल में बहुमत के आधार पर पार्टी कैसे तय हो सकती है?
कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि किसी राजनीतिक दल के विधिमंडल में किसी एक गुट के पास अधिक विधायक हैं, तो केवल उस बहुमत के आधार पर पूरे राजनीतिक दल पर दावा कैसे किया जा सकता है?
उन्होंने शिंदे गुट के विधायकों द्वारा व्हीप बदलने के फैसले का भी उल्लेख किया।
सिब्बल की दलील के मुताबिक, शिंदे गुट के 54 में से 35 विधायकों ने निर्णय लेकर व्हीप बदल दिया था।
उन्होंने यह भी तर्क रखा कि एक-तिहाई सदस्यों के आधार पर अलग गुट बनाने के लिए मूल राजनीतिक दल की मान्यता आवश्यक होती है। अन्यथा उस गुट को किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय करना पड़ता है।
पार्टी और चुनाव चिन्ह आवंटन पर भी सवाल
कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग द्वारा पार्टी और चुनाव चिन्ह के आवंटन को लेकर भी सवाल उठाया।
उनका तर्क था कि केवल विधिमंडल में बहुमत के आधार पर किसी एक गुट को पूरी राजनीतिक पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह देना उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने चुनाव आयोग के निर्णय और उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर अदालत के सामने कई कानूनी प्रश्न रखे।
पार्टी के अंदर नियुक्तियों पर आयोग का अधिकार?
सिब्बल का तीसरा प्रमुख तर्क राजनीतिक दल के आंतरिक संगठन और नियुक्तियों को लेकर था।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक राजनीतिक दल की अपनी अलग संगठनात्मक संरचना होती है। पार्टी में किस पद पर किस तरह नियुक्ति होगी और संगठन किस तरीके से चलेगा, यह पार्टी के संविधान और उसकी आंतरिक व्यवस्था से तय होता है।
उनके मुताबिक, अलग-अलग राजनीतिक दलों की संरचना अलग होती है और चुनाव आयोग को राजनीतिक दल की आंतरिक नियुक्तियों के हर पहलू में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं माना जा सकता।
कपिल सिब्बल के 23 प्रमुख मुद्दे
सुनवाई में रखे गए प्रमुख बिंदुओं को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है—
- एकनाथ शिंदे की ‘मुख्य नेता’ नियुक्ति पर सवाल उठाया गया।
- 1999 के शिवसेना संविधान में ‘मुख्य नेता’ पद का उल्लेख नहीं है।
- पार्टी संविधान में ‘पक्षप्रमुख’ पद का उल्लेख है।
- शिंदे खुद को ‘मुख्य नेता’ किस आधार पर कहते हैं, इस पर सवाल उठाया गया।
- शिंदे की नियुक्ति को 2018 के संविधान संशोधन से जोड़कर सवाल उठाया गया।
- यदि 2018 का संशोधन मान्य नहीं है तो उसी आधार पर नियुक्ति कैसे वैध हो सकती है?
- पार्टी से लाभ लेने के बाद उसकी व्यवस्था को लोकतांत्रिक नहीं बताने के दावे पर सवाल उठाया गया।
- चुनाव आयोग इस मामले में लवाद की तरह काम करता है।
- राजनीतिक दल में हुई फूट का निर्णय चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र का प्रश्न है।
- पार्टी का संविधान संवैधानिक या असंवैधानिक है, इसका निर्णय आयोग नहीं कर सकता।
- फूट विधिमंडल दल में हुई, राजनीतिक दल में नहीं।
- विधिमंडल दल और राजनीतिक दल अलग-अलग हैं।
- पार्टी और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को विधिमंडल के बहुमत के आधार पर दिया गया।
- चुनाव आयोग ने शिवसेना में फूट होने का निष्कर्ष निकाला।
- पार्टी और चुनाव चिन्ह के विवाद में अनुच्छेद 15 के तहत आयोग की शक्ति पर सवाल उठाया गया।
- शिंदे गुट के 54 में से 35 विधायकों ने व्हीप बदलने का निर्णय लिया।
- एक-तिहाई सदस्यों का अलग गुट बनाने के लिए मूल पार्टी की मान्यता का मुद्दा उठाया गया।
- अन्यथा उस गुट को किसी अन्य पार्टी में विलय करना पड़ता है।
- इसके बावजूद विधिमंडल के बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को पार्टी और चिन्ह दिया गया।
- राजनीतिक दल अपनी आंतरिक नियुक्तियों और संगठनात्मक व्यवस्था तय करता है।
- अलग-अलग दलों की संगठनात्मक संरचना अलग होती है।
- प्रत्येक पार्टी के संगठनात्मक नियम अलग हो सकते हैं।
- पार्टी के अंदर नियुक्तियों का फैसला चुनाव आयोग नहीं कर सकता।
संजय राऊत ने कहा- ‘हमें न्याय मिलेगा’
सुनवाई समाप्त होने के बाद ठाकरे गुट के नेता संजय राऊत ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि वे सुनवाई से संतुष्ट हैं और उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है।
कपिल सिब्बल की दलीलों के बाद ठाकरे गुट के नेताओं में भी मामले को लेकर आत्मविश्वास बढ़ा है। हालांकि, अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले की सभी कानूनी दलीलों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद ही आएगा।
शिवसेना विवाद में आगे क्या?
शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह को लेकर यह कानूनी लड़ाई लंबे समय से जारी है। चुनाव आयोग के फैसले के बाद उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
अब मामले में नियमित सुनवाई आगे बढ़ रही है। आज की सुनवाई के बाद अगली सुनवाई मंगलवार दोपहर 2 बजे होने की जानकारी दी गई है।
आने वाली सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलें और चुनाव आयोग के फैसले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर अदालत में आगे चर्चा होने की संभावना है।
सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह विवाद की सुनवाई के दौरान ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने एकनाथ शिंदे की ‘मुख्य नेता’ नियुक्ति, 1999 और 2018 के पार्टी संविधान, चुनाव आयोग के अधिकार और राजनीतिक दल तथा विधिमंडल दल के अंतर सहित 23 महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। उन्होंने विधिमंडल के बहुमत के आधार पर पार्टी और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को दिए जाने पर भी सवाल खड़े किए। सुनवाई के बाद संजय राऊत ने संतोष जताते हुए कहा कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को दोपहर 2 बजे होने की जानकारी दी गई है।








