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  • UNESCO ने ‘मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स’ को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया, भारत की विरासत को मिला वैश्विक सम्मान

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         भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर एक बार फिर दुनिया के नक्शे पर चमक उठी है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने वर्ष 2025 में 26 नए स्थलों को विश्व धरोहर सूची (World Heritage Sites) में शामिल किया है। इन चुनिंदा स्थलों में भारत का गौरवपूर्ण ‘मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स’ भी शामिल है। यह भारत का 44वां विश्व धरोहर स्थल बना है।

    ‘मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स’ दरअसल महाराष्ट्र और उसके आसपास के क्षेत्रों में फैले उन ऐतिहासिक किलों, दुर्गों और सैन्य संरचनाओं का समूह है, जिन्हें मराठा साम्राज्य ने अपने शासनकाल में बनाया और संजोया। इन संरचनाओं में न केवल स्थापत्य कला की अद्भुत झलक देखने को मिलती है बल्कि यह उस समय की सैन्य रणनीति, युद्धकला और स्वराज्य की भावना का भी प्रतीक है।

    मराठा साम्राज्य 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे शक्तिशाली ताकतों में से एक था। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित इस साम्राज्य ने न केवल दिल्ली सल्तनत और मुगलों को चुनौती दी बल्कि अंग्रेजों और पुर्तगालियों जैसी यूरोपीय शक्तियों का भी मुकाबला किया।
    शिवाजी महाराज और उनके उत्तराधिकारियों ने पश्चिमी घाट, कोंकण तट और दक्कन के पठारी इलाकों में कई मजबूत किले और दुर्ग बनवाए। रायगढ़, प्रतापगढ़, सिंहगढ़, राजगढ़, लोहगढ़ और विशालगढ़ जैसे किले मराठा साम्राज्य की सैन्य ताकत और रणनीति का प्रमाण हैं।

    UNESCO की ओर से किसी भी स्थल को विश्व धरोहर घोषित किए जाने का अर्थ है कि वह स्थान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असाधारण सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व रखता है।
    ‘मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स’ को यह मान्यता मिलने से मराठा साम्राज्य की सैन्य और सांस्कृतिक विरासत का वैश्विक स्तर पर प्रचार होगा। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। आने वाली पीढ़ियों के लिए इन धरोहरों का संरक्षण और संरक्षण कार्य आसान होगा।

    भारत सरकार ने इस उपलब्धि को ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा कि यह भारतीय संस्कृति और इतिहास की विविधता और शक्ति का वैश्विक स्वीकार है
    संस्कृति मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा—

    “मराठा साम्राज्य के किले और दुर्ग न केवल स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण हैं, बल्कि वे भारत की आज़ादी और स्वराज्य की भावना को भी दर्शाते हैं। UNESCO की मान्यता हमें इन धरोहरों के संरक्षण में और अधिक संसाधन और अवसर प्रदान करेगी।”

    महाराष्ट्र की जनता और मराठा समाज के लिए यह उपलब्धि गर्व का विषय है। स्थानीय संगठनों ने इसे शिवाजी महाराज की विरासत को वैश्विक पहचान मिलने की संज्ञा दी है। पुणे और रायगढ़ जैसे शहरों में लोगों ने इस घोषणा का स्वागत जुलूसों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ किया।

    मराठा किलों और दुर्गों में पहले से ही लाखों पर्यटक हर साल घूमने आते हैं। UNESCO की मान्यता के बाद यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ सकती है। इससे स्थानीय रोजगार में बढ़ोतरी होगी। हस्तशिल्प, खानपान और लोककला से जुड़े लोगों को नए अवसर मिलेंगे। महाराष्ट्र के पर्यटन नक्शे पर एक नया आकर्षण जुड़ जाएगा।

    हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इन धरोहरों को संरक्षित करने की चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। कई किले जर्जर अवस्था में हैं और आधुनिक विकास कार्यों की वजह से उनके अस्तित्व को खतरा है।
    UNESCO की मान्यता के बाद सरकार और स्थानीय निकायों पर इन धरोहरों के समुचित संरक्षण, देखरेख और आधुनिक तकनीक के उपयोग की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

    ‘मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स’ को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिलना न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव का क्षण है। यह ऐतिहासिक घोषणा हमें याद दिलाती है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत कितनी समृद्ध है और इसे संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी भी है।
    यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी और मराठा साम्राज्य की वीरता, स्वराज्य की भावना और स्थापत्य कौशल को वैश्विक पहचान दिलाएगी।

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