सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) भुषण आर. गवाई एक टिप्पणी को लेकर विवादों में घिर गए। खजुराहो के जवारी मंदिर की क्षतिग्रस्त विष्णु मूर्ति के पुनर्स्थापन मामले में सुनवाई के दौरान उनकी कही बात पर धार्मिक संगठनों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। मामला इतना बढ़ा कि CJI को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा— “मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूँ। मेरी टिप्पणी को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया।”
खजुराहो मामला क्या है?
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मध्य प्रदेश के खजुराहो समूह मंदिरों का ऐतिहासिक महत्व है। ये UNESCO विश्व धरोहर स्थल में शामिल हैं।
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जवारी मंदिर में स्थापित विष्णु की सात फुट ऊँची प्रतिमा वर्षों से क्षतिग्रस्त है।
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याचिकाकर्ता राकेश दलाल ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि इस प्रतिमा का पुनर्स्थापन किया जाए।
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उनका कहना था कि यह केवल पुरातत्व संरक्षण का प्रश्न नहीं है, बल्कि आस्था और धार्मिक अधिकार का भी मुद्दा है।
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उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) को इसके पुनर्निर्माण का आदेश दिया जाए।
कोर्ट में सुनवाई और CJI की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान CJI गवाई ने याचिकाकर्ता से कहा कि यह याचिका “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” जैसी लगती है। उन्होंने टिप्पणी की:
“आप कहते हैं आप विष्णु के भक्त हैं, तो जाओ और उनसे प्रार्थना करो। अपने देवता से पूछो। पूजा में कोई रुकावट नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा कि खजुराहो परिसर में शिवलिंग भी मौजूद है, जहाँ भक्त शिव की आराधना कर सकते हैं। अदालत ने साफ किया कि इस तरह के मामलों में ASI की जिम्मेदारी प्रमुख है, न कि सुप्रीम कोर्ट की।
विवाद कैसे बढ़ा?
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CJI की टिप्पणी का अंश सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
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कई धार्मिक संगठनों और हिंदू संगठनों ने इसे संवेदनहीन और आस्था को ठेस पहुँचाने वाला बताया।
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ट्विटर (X) और फेसबुक पर हैशटैग #CJIGavai ट्रेंड करने लगे।
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कुछ लोगों ने तो न्यायाधीश पर महाभियोग जैसी मांग तक उठा दी।
CJI गवाई की सफाई
विवाद बढ़ने पर CJI गवाई ने सार्वजनिक तौर पर बयान जारी कर कहा:
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“मेरी टिप्पणी को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया। मैं सभी धर्मों और आस्थाओं का सम्मान करता हूँ।”
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उनका कहना था कि अदालत की टिप्पणी मामले की गंभीरता और अधिकार क्षेत्र को लेकर थी, न कि किसी धर्म का अपमान करने के लिए।
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उन्होंने लोगों से अपील की कि इसे राजनीतिक या धार्मिक रंग न दिया जाए।
सरकार और कानूनी विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी CJI का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर कई बार बयान गलत संदर्भ में फैलाए जाते हैं।
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कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालतों को धार्मिक मामलों में अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए।
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पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठने से बचाने के लिए भाषा और शैली पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
याचिका का कानूनी पहलू
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भारतीय संविधान में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया गया है।
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लेकिन मूर्तियों का संरक्षण और पुनर्स्थापन पुरातत्व विभाग (ASI) के अधिकार क्षेत्र में आता है।
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अदालतें केवल यह देख सकती हैं कि क्या कोई संवैधानिक अधिकार सीधे प्रभावित हो रहा है या नहीं।
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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का मत है कि पूजा-अर्चना अभी भी संभव है, इसलिए यह आस्था का उल्लंघन नहीं है।
सामाजिक और राजनीतिक असर
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विपक्षी दलों ने कहा कि अदालत को ऐसे संवेदनशील विषयों पर शब्दों की मर्यादा रखनी चाहिए।
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भाजपा समर्थक वर्ग ने इसे “अनावश्यक विवाद” बताया और कहा कि न्यायपालिका पर भरोसा बनाए रखना ज़रूरी है।
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धार्मिक संगठनों का मानना है कि सरकार और ASI को मूर्ति पुनर्स्थापन की दिशा में जल्द कदम उठाना चाहिए, ताकि ऐसी स्थितियाँ बार-बार न बनें।
खजुराहो की विष्णु मूर्ति पुनर्स्थापन याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धर्म और न्यायपालिका के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। CJI गवाई की टिप्पणी पर बवाल मचने के बाद उनकी सफाई से विवाद कुछ हद तक शांत हुआ है, लेकिन यह घटना दिखाती है कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों में अदालतों को अत्यधिक सतर्क रहना पड़ता है।







