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  • ओम शांति! इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रभवो सुबियंतो ने UN में अपने भाषण का समापन किया

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    इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रभवो सुबियंतो ने 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने भाषण का एक अनोखा और ध्यान आकर्षित करने वाला समापन किया। उन्होंने अपने संदेश का अंत “ओम शांति, शांति, शांति, ओम” शब्दों से किया, जिसने न केवल वैश्विक नेताओं का ध्यान खींचा बल्कि सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो गया।

    सुबियंतो ने महासभा में अपने संबोधन में वैश्विक शांति, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया को केवल रणनीतिक समझौतों और राजनीतिक कूटनीति से नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना और सहिष्णुता के साथ आगे बढ़ना होगा। इसी संदर्भ में उन्होंने भाषण का समापन भारतीय और इंडोनेशियाई सांस्कृतिक प्रभाव वाले शब्दों से किया, जो शांति और एकता का प्रतीक हैं।

    UN में उनके इस अनोखे समापन ने वैश्विक मीडिया में चर्चा का विषय बना दिया। कई देशों के प्रतिनिधियों ने इसकी सराहना की और इसे “विश्व शांति के लिए प्रेरक संदेश” बताया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी #OmShantiShantiShantiOm ट्रेंड करने लगा, और लाखों लोग इस संदेश को साझा करने लगे।

    विशेषज्ञों के अनुसार, प्रभवो सुबियंतो का यह कदम न केवल इंडोनेशिया की विदेश नीति में शांति और सांस्कृतिक मूल्यों के महत्व को दर्शाता है, बल्कि यह दुनिया को यह याद दिलाने का प्रयास है कि राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ आध्यात्मिक चेतना भी वैश्विक स्थिरता में योगदान कर सकती है।

    भाषण के दौरान उन्होंने जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और वैश्विक स्वास्थ्य संकट जैसे मुद्दों पर भी अपनी स्पष्ट राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों के लिए जरूरी है कि उन्हें वैश्विक मंच पर न्यायपूर्ण अवसर मिले, और यह तभी संभव है जब सभी राष्ट्र सहिष्णुता, समझ और सहयोग के साथ आगे बढ़ें।

    भाषण का समापन करते समय “ओम शांति, शांति, शांति, ओम” कहने का उद्देश्य केवल शब्दों तक सीमित नहीं था। यह एक प्रतीकात्मक कृत्य था, जो विश्व नेताओं को याद दिलाता है कि शांति की ओर पहला कदम मानसिक और आध्यात्मिक समझ से शुरू होता है। यह संदेश इंडोनेशिया की संस्कृति और वैश्विक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जहां धार्मिक और सांस्कृतिक सहिष्णुता को महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इस भाषण के तुरंत बाद सोशल मीडिया और न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स पर कई प्रतिक्रियाएँ आईं। कुछ ने इसे अनोखा और प्रेरक बताया, जबकि अन्य ने इसे एक सृजनात्मक और ध्यान आकर्षित करने वाला तरीका करार दिया। इसके अलावा, वैश्विक विश्लेषकों ने कहा कि प्रभवो सुबियंतो ने अपने भाषण में औपचारिकता और आध्यात्मिकता का एक संतुलित मिश्रण प्रस्तुत किया, जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नया दृष्टिकोण पेश करता है।

    UN में उनके इस भाषण ने भारत और इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों पर भी चर्चा बढ़ा दी। भारतीय मंत्रियों और राजनयिकों ने कहा कि यह संदेश भारतीय संस्कृति के “ओम” और शांति की अवधारणा को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अनोखा अवसर है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भाषण केवल INDONESIA के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में केवल शक्ति और राजनीति ही महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि समझ, सहिष्णुता और सांस्कृतिक मूल्यों का पालन भी आवश्यक है।

    इस भाषण के बाद प्रभवो सुबियंतो ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने शब्दों का चयन इसलिए किया क्योंकि यह संदेश सरल, स्पष्ट और सभी संस्कृतियों के लिए समझने योग्य हो। उनका मानना है कि वैश्विक शांति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक चेतना से भी संभव है।

    संक्षेप में कहा जाए तो, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रभवो सुबियंतो का UNGA 2025 में भाषण और उसका “ओम शांति, शांति, शांति, ओम” के साथ समापन, विश्व समुदाय में शांति, सहिष्णुता और सांस्कृतिक समझ का प्रतीक बन गया है। यह भाषण न केवल मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना, बल्कि यह वैश्विक नेताओं और आम जनता दोनों के लिए प्रेरणादायक भी साबित हुआ।

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