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  • खांसी की सिरप में नहीं मिली विषैली मिलावट: केंद्र सरकार का दावा, तमिलनाडु में Coldrif सिरप के एक बैच में डाइएथिलीन ग्लाइकोल की पुष्टि

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    भारत में बच्चों की मौत के कुछ मामलों के बाद खांसी की सिरप की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार और तमिलनाडु राज्य सरकार के अलग‑अलग दावों ने इस मामले को और जटिल बना दिया है।

    जहां केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि खांसी की सिरप के हाल ही में परीक्षण किए गए किसी भी नमूने में डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) या एथिलीन ग्लाइकोल (EG) जैसे घातक रसायन नहीं पाए गए, वहीं तमिलनाडु ड्रग कंट्रोल अथॉरिटी ने Coldrif सिरप के एक बैच में DEG की पुष्टि करते हुए उसके उत्पादन और वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया है।

    केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार (3 अक्टूबर) को एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा:

    “हमने मध्य प्रदेश और राजस्थान में जिन बच्चों की मृत्यु हुई, उनसे जुड़े खांसी की सिरप के नमूनों की जांच करवाई है। परीक्षण में यह स्पष्ट हुआ है कि इनमें डाइएथिलीन ग्लाइकोल या एथिलीन ग्लाइकोल जैसे विषैले तत्व नहीं पाए गए हैं।”

    इस दावे के बाद केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक की जांचों में किसी भी दवा निर्माता कंपनी की ओर से मानक का उल्लंघन सामने नहीं आया है।

    इसके बावजूद, जांच टीमों को निर्देश दिए गए हैं कि वे पानी, पर्यावरणीय कारकों और अन्य संभावित कारणों की भी मल्टी-डिसिप्लिनरी जांच करें।

    वहीं, तमिलनाडु सरकार ने दावा किया है कि Coldrif खांसी सिरप के बैच नंबर SR-13 में डाइएथिलीन ग्लाइकोल की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है, जो गंभीर गुर्दा क्षति का कारण बन सकती है।

    राज्य के ड्रग कंट्रोल अधिकारियों ने कंपनी के उत्पादन केंद्र पर छापा मारा और उसे नोटिस जारी करते हुए कहा:

    “हमने Coldrif सिरप में DEG की उच्च मात्रा पाई है, जो बच्चों के लिए खतरनाक हो सकती है। इसके बाद राज्य में इस सिरप की बिक्री पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया गया है।”

    इस सिरप का निर्माण तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में स्थित एक दवा कंपनी द्वारा किया जा रहा था। फिलहाल, उत्पादन को स्थगित कर दिया गया है और अन्य बैचों के भी नमूनों की जांच की जा रही है।

    डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG) ऐसे रसायन हैं जो आम तौर पर औद्योगिक उपयोग में आते हैं — जैसे पेंट, ब्रेक फ्लूइड, और सॉल्वेंट में। लेकिन जब ये दवाओं में गलती से या जानबूझकर मिल जाते हैं, तो ये गंभीर विषाक्तता पैदा कर सकते हैं।

    विशेष रूप से बच्चों में, ये रसायन निम्न लक्षणों के साथ मौत तक का कारण बन सकते हैं:

    • किडनी फेल होना

    • उल्टी और डायरिया

    • तंत्रिका तंत्र पर असर

    • शरीर में तेज़ विषाक्तता

    इसलिए इनका मेडिकल दवाओं में मिलना खतरनाक और गैरकानूनी है।

    भारत में दवाओं में DEG मिलावट के मामले नए नहीं हैं। 2022-23 में गाम्बिया, उज्बेकिस्तान और कैमरून में भारतीय दवाओं को लेकर गंभीर सवाल उठे थे, जहाँ बच्चों की मौत DEG युक्त सिरप के कारण हुई थी। इसके बाद WHO ने भारत की कई दवा कंपनियों को ग्लोबल अलर्ट में रखा था।

    ऐसे में वर्तमान मामला फिर से भारत की दवा गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

    हालिया घटनाक्रम में केंद्र और तमिलनाडु के बयानों में स्पष्ट अंतर देखा जा रहा है।

    • केंद्र कह रहा है कि सभी सैंपल साफ हैं,

    • तमिलनाडु कह रहा है कि कम से कम एक बैच में ज़हरीले रसायन पाए गए हैं

    यह विवाद इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत में राज्य और केंद्र स्तर पर दवा परीक्षण एवं निगरानी प्रणाली में समन्वय की कमी हो सकती है।

    फार्मास्युटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि:

    • किसी भी दवा का उत्पादन WHO-GMP मानकों के तहत होना चाहिए।

    • दवाओं में प्रयुक्त सभी रॉ मटेरियल का प्रत्येक बैच परीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।

    • सरकार को एकीकृत राष्ट्रीय फार्मा निगरानी पोर्टल बनाना चाहिए जिससे ऐसे मामलों को तुरंत पहचाना जा सके।

    इस पूरे विवाद से एक बात तो स्पष्ट है कि भारत में दवा की गुणवत्ता को लेकर निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

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