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  • दो पड़ोसी, दो चुनाव: बांग्लादेश और नेपाल की सियासी हलचल पर भारत की पैनी नजर

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    दक्षिण एशिया के राजनीतिक परिदृश्य में इन दिनों हलचल तेज है। एक ओर बांग्लादेश में अगले साल होने वाले आम चुनावों की तैयारियां जोर पकड़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर नेपाल में वाम दलों के नए गठबंधन ने देश की राजनीति को एक बार फिर नई दिशा दे दी है। भारत, जो इन दोनों देशों के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध रखता है, इन घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर बनाए हुए है। दरअसल, बांग्लादेश और नेपाल दोनों की सियासत का असर सीधे भारत के सीमावर्ती इलाकों, सुरक्षा रणनीतियों और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर पड़ता है।

    बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता चौथी बार मजबूत करने की कोशिश में है। हालांकि विपक्षी दल बीएनपी (Bangladesh Nationalist Party) लगातार सरकार पर निष्पक्ष चुनाव न कराने के आरोप लगा रहा है। वहां की सड़कों पर विपक्षी प्रदर्शनों और हिंसक झड़पों ने माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है। भारत के लिए शेख हसीना की सरकार एक भरोसेमंद साझेदार रही है — खासकर आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दों पर। हसीना सरकार के दौरान भारत-बांग्लादेश के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। यही कारण है कि भारत नहीं चाहता कि ढाका की सत्ता में कोई अस्थिरता पैदा हो जो इन संबंधों को कमजोर करे।

    भारत की पड़ोसी नीति “Neighbourhood First” के तहत बांग्लादेश का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच 4,000 किलोमीटर से अधिक की साझा सीमा है, और यह सीमा न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अहम है। अगर बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, तो उसका असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक महसूस किया जा सकता है। इसी वजह से नई दिल्ली की कोशिश है कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुचारू रूप से चले और दोनों देशों के बीच आपसी भरोसा बना रहे।

    दूसरी ओर, नेपाल में हाल ही में वाम दलों के नए गठबंधन ने राजनीतिक संतुलन को फिर से हिला दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व में UML (United Marxist Leninist) और अन्य वामपंथी दलों के एकजुट होने से नेपाली राजनीति में एक बार फिर से “वाम ध्रुवीकरण” की वापसी हो रही है। यह गठबंधन प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ के लिए चुनौती बनता जा रहा है। भारत के लिए नेपाल में यह राजनीतिक पुनर्संयोजन खास दिलचस्प है क्योंकि इसका असर दोनों देशों के बीच संबंधों पर सीधा पड़ सकता है।

    नेपाल लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता रहा है। कभी काठमांडू बीजिंग के करीब दिखाई देता है तो कभी नई दिल्ली से रिश्ते मजबूत करने की बात करता है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने नेपाल में बुनियादी ढांचे और निवेश के क्षेत्र में अपनी पैठ गहरी की है, जिससे भारत के लिए चिंता बढ़ी है। अब जब वामपंथी दलों का नया गठबंधन उभर रहा है, तो कूटनीतिक समीकरण एक बार फिर बदल सकते हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि नेपाल की राजनीतिक दिशा उसकी सुरक्षा और आर्थिक हितों के विपरीत न जाए।

    भारत की नजर इस बात पर भी है कि इन दोनों पड़ोसी देशों में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर न पड़ें। दक्षिण एशिया पहले ही श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में अस्थिरता का दौर देख चुका है। ऐसे में बांग्लादेश और नेपाल में राजनीतिक स्थिरता इस पूरे क्षेत्र की शांति और प्रगति के लिए जरूरी है। भारत का यह रुख हमेशा से रहा है कि उसके पड़ोसी लोकतांत्रिक और समृद्ध हों ताकि क्षेत्र में साझा विकास का माहौल बने।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में भारत अपनी “शांत कूटनीति” के ज़रिए दोनों देशों के नेताओं से संवाद बढ़ाएगा। दिल्ली इस बात पर जोर दे रही है कि बांग्लादेश में चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी हों, जबकि नेपाल के साथ सहयोग के नए आयाम तलाशे जाएं। भारत के लिए ये दोनों मोर्चे केवल पड़ोसी राजनीति नहीं बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सहयोग, व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क के दृष्टिकोण से भी अत्यंत अहम हैं।

    संक्षेप में कहा जाए तो बांग्लादेश और नेपाल के चुनाव सिर्फ उनकी आंतरिक राजनीति का विषय नहीं हैं, बल्कि दक्षिण एशिया की कूटनीतिक तस्वीर को भी प्रभावित करने वाले हैं। भारत के लिए यह समय रणनीतिक सतर्कता और संतुलित कूटनीति का है — ताकि पड़ोस में स्थिरता भी बनी रहे और “सबका साथ, सबका विकास” की नीति क्षेत्रीय स्तर पर भी साकार हो सके।

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