बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले से सामने आई एक भयावह घटना ने पूरे देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी झकझोर कर रख दिया है। यहां एक हिंदू युवक की कथित तौर पर भीड़ द्वारा बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस मामले में मृतक के पिता ने जो बयान दिया है, उसने घटना की क्रूरता को और भी भयावह बना दिया है। पिता का आरोप है कि उनके बेटे को पहले बुरी तरह पीटा गया, फिर पेड़ से बांधकर उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी गई।
मृतक की पहचान 27 वर्षीय दीपु चंद्र दास के रूप में हुई है। यह घटना शुक्रवार को उस समय घटी, जब बांग्लादेश में युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद व्यापक अशांति और विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। इसी अशांत माहौल के बीच यह हिंसक घटना सामने आई, जिसने अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दीपु चंद्र दास के पिता रविलाल दास ने NDTV से बातचीत में कहा कि उन्हें इस घटना की जानकारी सबसे पहले सोशल मीडिया के जरिए मिली। उन्होंने बताया कि शुरुआत में किसी ने उन्हें कहा कि उनके बेटे को बुरी तरह पीटा गया है। इसके कुछ ही समय बाद परिवार के एक सदस्य ने आकर बताया कि दीपु को भीड़ ने पकड़ लिया है और उसे एक पेड़ से बांध दिया गया है।
रविलाल दास ने भावुक होते हुए कहा, “यह एक भयानक घटना थी। उन्होंने मेरे बेटे को पेड़ से बांधा, फिर उस पर केरोसिन डाला और आग लगा दी। उसका जला हुआ शव बाहर छोड़ दिया गया।” पिता के इस बयान ने पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना के बाद से परिवार पूरी तरह टूट चुका है और उन्हें सरकार की ओर से किसी तरह का कोई आश्वासन नहीं मिला है।
पीड़ित पिता ने आरोप लगाया कि अब तक बांग्लादेश सरकार या प्रशासन की ओर से उनसे संपर्क नहीं किया गया है। “किसी ने कोई भरोसा नहीं दिया। किसी ने कुछ नहीं कहा,” रविलाल दास ने निराशा जाहिर करते हुए कहा। उनके अनुसार, परिवार को न तो सुरक्षा का भरोसा मिला है और न ही न्याय को लेकर कोई ठोस आश्वासन।
इस घटना को लेकर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और प्रशासन की ओर से प्रतिक्रिया भी सामने आई है। बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने कहा है कि इस मामले में अब तक सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है। सरकार के अनुसार, रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) ने विभिन्न स्थानों पर अभियान चलाकर संदिग्धों को हिरासत में लिया है।
गिरफ्तार किए गए आरोपियों में मोहम्मद लिमोन सरकार (19), मोहम्मद तारिक हुसैन (19), मोहम्मद मानिक मिया (20), इरशाद अली (39), निजुम उद्दीन (20), आलमगीर हुसैन (38) और मोहम्मद मिराज हुसैन आकोन (46) शामिल हैं। प्रशासन का दावा है कि जांच तेजी से आगे बढ़ रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
बांग्लादेश सरकार ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि “नए बांग्लादेश में इस तरह की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है।” सरकार के बयान में यह भी कहा गया कि इस जघन्य अपराध में शामिल किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जाएगा और सभी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
गौरतलब है कि युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश के कई हिस्सों में हिंसा और विरोध प्रदर्शन भड़क उठे थे। इन प्रदर्शनों का रुख धीरे-धीरे राजनीतिक के साथ-साथ सांप्रदायिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की ओर भी बढ़ता गया। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शनों में भारत विरोधी नारे लगाए गए और ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग समेत चटगांव, खुलना और राजशाही में सहायक उच्चायोगों के पास भी प्रदर्शन हुए।
इतना ही नहीं, अशांति के दौरान कुछ मीडिया संस्थानों को भी निशाना बनाया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, देश के प्रमुख अखबारों में शामिल ‘द डेली स्टार’ के कार्यालय पर भी हमला किया गया। इन घटनाओं ने बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
इससे पहले भारत सरकार ने भी पड़ोसी देश में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। बांग्लादेश के उच्चायुक्त रियाज हामिदुल्लाह को भारत के विदेश मंत्रालय में तलब किया गया था, जहां ढाका में भारतीय मिशन की सुरक्षा और चरमपंथी तत्वों से उत्पन्न खतरे को लेकर औपचारिक विरोध दर्ज कराया गया।
मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दीपु चंद्र दास की हत्या की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और भीड़ द्वारा कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति का खतरनाक संकेत है। संगठनों ने स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए पीड़ित परिवार को सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने की अपील की है।
कुल मिलाकर, मयमनसिंह की यह घटना बांग्लादेश के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। एक ओर सरकार कानून का राज स्थापित करने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर इस तरह की घटनाएं जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। अब देखना होगा कि जांच कितनी पारदर्शी होती है और पीड़ित परिवार को कब तक न्याय मिल पाता है।








