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भारत में डिजिटल भुगतान की रीढ़ माने जाने वाले यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से जुड़े करोड़ों यूजर्स के लिए नया साल बड़ी राहत लेकर आ रहा है। रोजमर्रा के लेनदेन के साथ-साथ सब्सक्रिप्शन और ऑटोपेमेंट की सुविधा देने वाला UPI अब और ज्यादा पारदर्शी तथा सुरक्षित होने जा रहा है। नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने ऑटोपे से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव करने का फैसला लिया है, जिससे ऐप फ्रॉड, अनावश्यक कटौती और डार्क पैटर्न जैसी समस्याओं पर रोक लगेगी।
अब तक कई यूजर्स की शिकायत रही है कि वे किसी ई-कॉमर्स या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फ्री ट्रायल या डिस्काउंट के नाम पर ऑटोपे को मंजूरी दे देते थे, लेकिन बाद में उनके खाते से हर महीने पैसे अपने-आप कटते रहते थे। कई बार इन सब्सक्रिप्शन को बंद करना या ट्रैक करना इतना आसान नहीं होता था। इसी समस्या को देखते हुए NPCI ने नए नियम लागू करने का निर्णय लिया है, जो 31 दिसंबर 2025 तक सभी UPI ऐप्स पर लागू कर दिए जाएंगे।
NPCI ने 7 अक्टूबर 2025 को जारी अपने सर्कुलर में साफ किया है कि UPI ऑटोपे सब्सक्रिप्शन में अब यूजर्स को ज्यादा नियंत्रण दिया जाएगा। इसके तहत एक सेंट्रल पोर्टल upihelp.npci.org.in लॉन्च किया गया है, जहां ग्राहक अपने सभी सक्रिय ऑटोपे सब्सक्रिप्शन को एक ही जगह देख और मैनेज कर सकेंगे। इससे यूजर्स को अलग-अलग ऐप्स में जाकर जानकारी ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
नए नियमों के अनुसार, UPI यूजर्स अब किसी भी ऐप के “Manage Bank Account” या “Autopay” सेक्शन में जाकर यह देख सकेंगे कि कौन-कौन से सब्सक्रिप्शन सक्रिय हैं, कितनी राशि कट रही है और किस तारीख को भुगतान हो रहा है। यदि कोई सब्सक्रिप्शन अनावश्यक लगे, तो उसे कुछ ही क्लिक में बंद किया जा सकेगा। इससे उन लोगों को बड़ी राहत मिलेगी, जो अनजाने में लंबे समय तक ऑटोपे में फंसे रहते थे।
ई-कॉमर्स कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए यह बदलाव किसी झटके से कम नहीं है। पहले कई कंपनियां यूजर्स को कैशबैक, ऑफर या फ्री ट्रायल का लालच देकर ऑटोपे चालू करवा लेती थीं और बाद में उसे बंद करना मुश्किल बना देती थीं। NPCI ने अब ऐसे डार्क पैटर्न पर सख्ती दिखाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि बिना पूरी जानकारी और सहमति के कोई भी ऑटोपेमेंट स्वीकार्य नहीं होगा।
इन नए नियमों का एक अहम पहलू यह भी है कि अब यूजर्स अपने ऑटोपे सब्सक्रिप्शन को एक UPI ऐप से दूसरे UPI ऐप में पोर्ट कर सकेंगे। यानी यदि कोई ग्राहक एक ऐप से दूसरे ऐप पर शिफ्ट होना चाहता है, तो उसे सब्सक्रिप्शन दोबारा शुरू करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हालांकि सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह पोर्टिंग प्रक्रिया 90 दिनों में सिर्फ एक बार ही की जा सकेगी और हर बदलाव के लिए UPI PIN अनिवार्य होगा।
NPCI ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐप कंपनियां यूजर्स को बार-बार ऐप बदलने के लिए कैशबैक या अन्य प्रलोभन नहीं दे सकेंगी। ऑटोपे से जुड़ा डेटा केवल जानकारी दिखाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जाएगा, किसी भी तरह के मार्केटिंग या अन्य व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं। इससे यूजर्स की प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।
डिजिटल भुगतान विशेषज्ञों का मानना है कि NPCI का यह कदम भारत के डिजिटल इकोसिस्टम को और मजबूत बनाएगा। बढ़ती ऑनलाइन सेवाओं और सब्सक्रिप्शन मॉडल के दौर में पारदर्शिता और यूजर कंट्रोल बेहद जरूरी हो गया है। नए नियम न सिर्फ फ्रॉड को कम करेंगे, बल्कि लोगों का UPI पर भरोसा भी बढ़ाएंगे।
कुल मिलाकर, नए साल से लागू होने वाले UPI के ये नियम आम उपभोक्ताओं के हित में एक बड़ा और सकारात्मक कदम हैं। अब यूजर्स अपने पैसों पर खुद नियंत्रण रख सकेंगे, अनावश्यक कटौती से बच पाएंगे और डिजिटल पेमेंट को बिना डर के इस्तेमाल कर सकेंगे। NPCI की यह पहल आने वाले समय में UPI को और सुरक्षित, भरोसेमंद और यूजर-फ्रेंडली बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।








