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भारतीय परंपरा, संस्कृति और हस्तकला की पहचान सदियों से हमारे वस्त्रों में झलकती रही है। इन्हीं पारंपरिक कलाओं में एक अनमोल धरोहर है कोसा सिल्क साड़ी, जो अपनी प्राकृतिक चमक, मजबूती और शालीनता के लिए जानी जाती है। इस विरासत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का कार्य किया है खेमचंद रामकृष्ण सोनकुसरे ने, जिनके नेतृत्व में स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम आज महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देशभर में पारंपरिक कोसा साड़ियों का एक प्रतिष्ठित नाम बन चुका है।
स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम की कहानी किसी बड़े शहर के बोर्डरूम में नहीं, बल्कि गाँव की सादगी और मेहनत से शुरू हुई। वर्ष 1992 में एक छोटे से हैंडलूम यूनिट के रूप में इस सफर की शुरुआत हुई। वर्ष 2002 में महाराष्ट्र के भंडारा जिले के अंधलगांव में औपचारिक रूप से यूनिट की स्थापना की गई। खेमचंद सोनकुसरे और उनके परिवार ने गाँव-गाँव जाकर कोसा साड़ियों को बढ़ावा दिया, लोगों को इसकी गुणवत्ता और परंपरा से परिचित कराया।
शुरुआती वर्षों में चुनौतियाँ कम नहीं थीं। सीमित संसाधन, बाजार की कमी और पारंपरिक उद्योग के प्रति घटता रुझान—इन सभी के बावजूद सोनकुसरे परिवार ने हार नहीं मानी। निरंतर परिश्रम और विश्वास के बल पर उन्होंने विदर्भ के कई गांवों जैसे मोहाड़ी, पवनी और उमरेड में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
समय के साथ स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम का विस्तार हुआ और नागपुर के सीताबर्डी क्षेत्र में, झांसी रानी चौक के समीप, एक भव्य शोरूम की शुरुआत की गई। यह शोरूम आज महाराष्ट्र के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों के ग्राहकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुका है। यहीं से कोसा साड़ियों की आपूर्ति पूरे राज्य और देशभर में की जाती है।
स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम ने अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए विभिन्न राज्यों और प्रदर्शनियों में भाग लिया। साड़ियों के विशेष डिज़ाइन के लिए उत्पादन को अलग-अलग राज्यों तक पहुँचाया गया—
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गुजरात में अजरख प्रिंट,
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राजस्थान में डाबू प्रिंट,
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और मध्य प्रदेश (धार क्षेत्र) में बैग प्रिंट का कार्य कराया जाता है।
इन विशेष डिज़ाइनों वाली कोसा साड़ियाँ नागपुर और अन्य बड़े शहरों में अत्यधिक लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि आज कोसा सिल्क साड़ियाँ देश के कोने-कोने में पसंद की जा रही हैं।
खेमचंद सोनकुसरे अपने पिता रामकृष्ण सोनकुसरे को अपना मार्गदर्शक मानते हैं, जिनके अनुभव और मार्गदर्शन से यह व्यवसाय आगे बढ़ा। खासकर करवटी बॉर्डर और टसर सिल्क वाली कोसा साड़ियाँ विदर्भ क्षेत्र, महिला राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। हाल ही में कोसा सिल्क को मिला GI (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग इसकी मांग को दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों तक ले गया है।
स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम में 10 से 12 प्रकार की कोसा साड़ियाँ उपलब्ध हैं। इनमें प्रिंटेड साड़ियाँ सबसे अधिक मांग में रहती हैं। इसके अलावा हाथ से पेंट की गई कलमकारी साड़ियाँ और पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन की कांथा हैंडवर्क साड़ियाँ भी संग्रह का हिस्सा हैं। साड़ियों की कीमत ₹5,000 से ₹25,000 तक होती है, जो उनकी उत्कृष्ट गुणवत्ता और कारीगरी को दर्शाती है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि NADT (नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस) के दीक्षांत समारोहों के लिए हर वर्ष 50 से अधिक साड़ियों का ऑर्डर भी यहीं से जाता है।
स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का उदाहरण भी है। कंपनी टसर सिल्क किसानों से उचित मूल्य पर रेशम खरीदती है और समय पर भुगतान सुनिश्चित करती है। इससे आदिवासी समुदायों और ग्रामीण कारीगरों की आजीविका मजबूत होती है। यह उत्पादन प्रक्रिया वन क्षेत्रों में होती है, जिसमें वन विभाग और रेशम विभाग का सहयोग रहता है, जिससे पर्यावरण संतुलन भी बना रहता है।
रेशम धागे की प्रोसेसिंग से लेकर करवटी कोसा साड़ी की बुनाई तक, स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम ने सैकड़ों परिवारों को रोजगार प्रदान किया है। यह संस्था पारंपरिक कोसा साड़ी की विरासत को जीवित रखते हुए नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य कर रही है।
खेमचंद सोनकुसरे को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए “महाराष्ट्र बिजनेस आइकॉन 2025 / महाराष्ट्र स्टाइल आइकॉन 2025 / महाराष्ट्र फैशन आइकॉन 2025” जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों के लिए चयनित किया गया है। यह सम्मान Reseal.in और India Fashion Icon Magazine द्वारा प्रदान किया जा रहा है। यह उपलब्धि न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे विदर्भ और महाराष्ट्र के लिए गर्व का विषय है।
इस भव्य पुरस्कार समारोह में प्रसिद्ध फिल्म हस्तियों वरिष्ठ अभिनेत्री वर्षा उसगांवकर, अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी और प्रार्थना बेहेरे की उपस्थिति कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएगी। यह आयोजन Reseal.in (Sure Me Multipurpose Pvt. Ltd.) के संस्थापक एवं सीईओ श्री सुधीर कुमार पठाडे
के नेतृत्व में संपन्न हो रहा है, जो उभरते उद्यमियों और कलाकारों को राष्ट्रीय मंच प्रदान करने के लिए जाने जाते हैं।
आज स्वर्णहंसा कोसा एम्पोरियम परंपरा और आधुनिकता का एक आदर्श उदाहरण बन चुका है। खेमचंद सोनकुसरे की यह यात्रा साबित करती है कि अगर संकल्प मजबूत हो और जड़ों से जुड़कर काम किया जाए, तो परंपरा भी वैश्विक पहचान बना सकती है।








