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  • नाशिक महापालिका राजनीति: शिवसेना में गुटबाज़ी, तिदमे का उपमहापौर विवाद

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    नाशिक महापालिके के उपमहापौर पद के चुनाव को लेकर शिवसेना (एकनाथ शिंदे गट) में एक बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया है। पार्टी के वरिष्ठ नगरसेवक प्रवीण तिदमे ने यह पद नहीं मिलने पर अपनी नाराज़गी जाहिर की और नगरसेवक पद से इस्तीफ़ा देने की चेतावनी दी थी, जिससे स्थानीय राजनीति में हलचल बढ़ गई।

    तिदमे मूल रूप से उपमहापौर पद के उम्मीदवार थे, लेकिन यह पद विलास शिंदे को दिया गया, जिन्होंने 2025 में शिवसेना में शामिल होने के बाद यह भूमिका निभाई है। इससे नाराज़ तिदमे ने सोशल मीडिया पर अपनी不満 व्यक्त करते हुए कहा था कि पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं का सम्मान नहीं किया गया है और संगठन में गुटबाज़ी बढ़ रही है।

    इस्तीफ़ा और शिंदे की समझौता पहल

    नाराज़गी को देखते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने तिदमे से फोन पर बात की और स्थिति को संभालने की कोशिश की। शिंदे ने कहा कि पूरा शिवसेना संगठन तिदमे के साथ है और उन्हें किसी भी निर्णय को सोच-समझकर लेना चाहिए। शिंदे की हस्तक्षेप के बाद तिदमे ने अपना राजीनामा देने का फैसला वापस ले लिया

    तिदमे ने कहा कि शिंदे के अलावा कई वरिष्ठ नेताओं ने उनसे बात की और उन्हें समझाया कि जनता द्वारा दिए गए जनादेश का सम्मान करना महत्वपूर्ण है और संगठनात्मक निर्णयों का सम्मान जरूरी है।

     विवाद के कारण

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद शिंदे गट में प्रवेश करने वाले नए नेताओं और पुराने दावेदारों के बीच संतुलन पर उभर रहा है। विलास शिंदे, जो 2025 में शिवसेना में शामिल हुए थे, को उपमहापौर पद मिलने से पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष दिखाई दे रहा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि संगठन के अंदर पुराने और मेहनती सदस्यों का सम्मान कम हो रहा है।

    तिदमे ने दावा किया कि उन्होंने पार्टी के लिए स्थानीय स्तर पर लंबे समय तक काम किया है और इसके ज़रिये शहर में विकास के कामों में सक्रिय भूमिका निभाई है, लेकिन पद वितरण में प्राथमिकता नए लोगों को दिए जाने से पुराने नेताओं में निराशा पैदा हुई है।

    नाशिक महापालिका का राजनीतिक परिदृश्य

    पिछले महीने नाशिक महापालिका में भाजपा के हिमगौरी अहेर को महापौर और शिंदे गट के विलास शिंदे को उपमहापौर चुना गया था। इससे प्रशासनिक शासन का दौर समाप्त हुआ और राजनीतिक गठबंधन की तस्वीर स्पष्ट हुई थी।

    हालाँकि यह परिणाम भाजपा-शिंदे शिवसेना गठबंधन के पक्ष में रहा, लेकिन इसके बाद शिवसेना के अंदर नाराज़गी और गुटबाज़ी के संकेत भी दिखे हैं, जिससे स्थानीय राजनीति में अस्थिरता की आशंका बनी हुई है।

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