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ईरान और इज़राइल के बीच जारी युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है और इसका सीधा असर भारत के शेयर बाजार, तेल की कीमतों और महंगाई पर देखने को मिल रहा है। हाल के दिनों में भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों की बड़ी पूंजी डूब गई है और आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, बाजार में भारी बिकवाली के चलते एक ही दिन में करीब ₹5 लाख करोड़ की निवेशकों की संपत्ति साफ हो गई। BSE Sensex में 1400 से 1500 अंकों की गिरावट दर्ज की गई, जबकि Nifty 50 भी 22,600 के आसपास फिसल गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है, जिसने वैश्विक निवेशकों के बीच डर का माहौल बना दिया है। निवेशक अब जोखिम से बचने के लिए शेयर बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
इस युद्ध का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जिससे भारत जैसे तेल आयातक देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव बढ़ गया है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे आम जनता की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक पड़ता है। इससे महंगाई यानी इंफ्लेशन बढ़ने का खतरा काफी बढ़ गया है।
इसी के साथ भारतीय मुद्रा पर भी दबाव बढ़ा है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और तेल आयात के लिए बढ़ती डॉलर की मांग ने रुपये को कमजोर कर दिया है।
मार्च महीने में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से अरबों डॉलर निकाल लिए हैं, जिससे बाजार की स्थिति और कमजोर हो गई है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर अलग-अलग सेक्टर पर अलग तरीके से देखने को मिल रहा है। एविएशन, ऑटो, पेंट और केमिकल जैसे सेक्टरों पर दबाव बढ़ा है, क्योंकि इनकी लागत सीधे तेल की कीमतों से जुड़ी होती है। वहीं, कुछ तेल और रक्षा कंपनियों को इस स्थिति से फायदा भी हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर और गंभीर हो सकता है। महंगाई बढ़ने से रिजर्व बैंक पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव आ सकता है, जिससे लोन महंगे हो सकते हैं और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
इसके अलावा, वैश्विक व्यापार पर भी असर पड़ने की आशंका है। यदि तेल आपूर्ति बाधित होती है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो इसका असर पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इसे अस्थायी गिरावट भी मान रहे हैं। उनका कहना है कि जैसे ही युद्ध की स्थिति सामान्य होती है, बाजार में रिकवरी देखने को मिल सकती है। लेकिन फिलहाल निवेशकों को सतर्क रहने और सोच-समझकर निवेश करने की सलाह दी जा रही है।
कुल मिलाकर, ईरान-इज़राइल युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि वैश्विक घटनाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। शेयर बाजार में गिरावट, तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई का खतरा — ये तीनों मिलकर देश की आर्थिक स्थिति को चुनौती दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह संकट कितना लंबा चलता है और भारत इससे कैसे निपटता है।








