अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के बाद एक ऐसे सैन्य अभियान की जानकारी सामने आई है, जिसने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ने तथा होर्मुज स्ट्रेट पर संकट गहराने के बाद भारतीय नौसेना ने अपने इतिहास के सबसे बड़े समुद्री सुरक्षा अभियानों में से एक ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ को अंजाम दिया।
इस अभियान का उद्देश्य युद्धग्रस्त क्षेत्र में फंसे भारतीय कच्चे तेल, एलएनजी (LNG) और एलपीजी (LPG) से लदे जहाजों को सुरक्षित भारत पहुंचाना था। भारतीय नौसेना ने पूरी रणनीति और आधुनिक सैन्य संसाधनों के साथ इस मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया।
होर्मुज स्ट्रेट में फंस गए थे भारतीय जहाज
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट की आवाजाही प्रभावित कर दी, जिससे भारत सहित कई देशों के व्यापारिक जहाज संकट में फंस गए।
भारत के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर थी क्योंकि देश अपनी आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल और 90 प्रतिशत कमर्शियल एलपीजी इसी समुद्री मार्ग से आयात करता है।
युद्ध के दौरान भारत से जुड़े लगभग 36 से 38 व्यापारिक जहाज प्रभावित हुए, जिनमें 22 से 24 जहाज ऐसे थे जो ऊर्जा आपूर्ति से सीधे जुड़े हुए थे। इन जहाजों पर 600 से अधिक भारतीय नाविक सवार थे।
‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ के तहत हुआ रेस्क्यू
भारतीय नौसेना ने पहले से संचालित ‘ऑपरेशन संकल्प’ का विस्तार करते हुए ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ शुरू किया। इस अभियान के तहत युद्धपोतों ने ऊर्जा से जुड़े जहाजों को सुरक्षा घेरे में लेकर उन्हें होर्मुज स्ट्रेट से बाहर निकाला और सुरक्षित रूप से ओमान की खाड़ी तथा अरब सागर के रास्ते भारत के पश्चिमी तट तक पहुंचाया।
सुरक्षित निकाले गए प्रमुख जहाजों में शिवालिक, नंदा देवी, पाइन गैस, जग वसंत और जग लाडकी जैसे महत्वपूर्ण एलपीजी एवं क्रूड ऑयल टैंकर शामिल थे।
समुद्र में तैनात रही भारतीय नौसेना की पूरी ताकत
संकट की स्थिति को देखते हुए भारतीय नौसेना ने सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक सैन्य तैनाती की। जहां सामान्यतः इस क्षेत्र में एक या दो युद्धपोत गश्त करते हैं, वहीं इस अभियान के दौरान छह से सात फ्रंटलाइन युद्धपोत लगातार तैनात रहे।
इनमें आधुनिक गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर, स्टील्थ फ्रिगेट और ऑफशोर पेट्रोल वेसल्स शामिल थे। इनका मुख्य उद्देश्य भारतीय जहाजों को सुरक्षित एस्कॉर्ट देना और किसी भी संभावित हमले से उनकी रक्षा करना था।
हजारों नौसैनिक और मार्कोस कमांडो रहे अलर्ट
ऑपरेशन के दौरान लगभग 1,500 से 2,000 नौसैनिक और अधिकारी चौबीसों घंटे युद्ध स्तर की तैयारी में तैनात रहे।
हर महत्वपूर्ण युद्धपोत पर मरीन कमांडो फोर्स मार्कोस (MARCOS) की विशेष टीमें मौजूद थीं। उनका कार्य संदिग्ध नौकाओं की जांच करना, संभावित ड्रोन या आतंकी खतरे से निपटना और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई करना था।
आसमान से भी रखी गई हर गतिविधि पर नजर
समुद्र के विशाल क्षेत्र की निगरानी के लिए भारतीय नौसेना ने अपनी हवाई ताकत का भी व्यापक उपयोग किया।
P-8I पोसाइडन समुद्री निगरानी विमान लगातार उड़ान भरते रहे और समुद्र में मौजूद हर गतिविधि पर नजर रखते रहे। इसके अलावा सी किंग, एएलएच ध्रुव हेलीकॉप्टर तथा MQ-9B सी-गार्डियन ड्रोन का भी उपयोग किया गया, जिन्होंने 30 घंटे से अधिक समय तक लगातार निगरानी करते हुए मुख्यालय को लाइव जानकारी उपलब्ध कराई।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा बनी रही सुरक्षित
भारतीय नौसेना की इस त्वरित और रणनीतिक कार्रवाई का सबसे बड़ा परिणाम यह रहा कि युद्ध जैसे हालात के बावजूद भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई। करोड़ों रुपये मूल्य के कच्चे तेल और गैस से लदे जहाज सुरक्षित भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच गए, जिससे संभावित ऊर्जा संकट और आर्थिक नुकसान को टाल दिया गया।
अब अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट दोबारा सामान्य रूप से खुल चुका है। इसके साथ ही भारतीय नौसेना का यह चुनौतीपूर्ण अभियान भी सफलतापूर्वक पूरा हो गया है और सभी युद्धपोत अपनी नियमित समुद्री सुरक्षा जिम्मेदारियों पर लौट चुके हैं।
भारतीय नौसेना का यह मिशन न केवल उसकी सामरिक क्षमता का प्रमाण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि संकट की घड़ी में देश की ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए भारत पूरी तरह सक्षम और तैयार है।







