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  • ब्रेन ड्रेन रोकने की तैयारी में मोदी सरकार, विदेशों में बसे भारतीय वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को भारत लौटने का बड़ा ऑफर

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    दशकों से भारत के सबसे प्रतिभाशाली छात्र और वैज्ञानिक बेहतर अवसरों की तलाश में विदेशों का रुख करते रहे हैं। अब इस ‘ब्रेन ड्रेन’ की चुनौती से निपटने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने प्रधानमंत्री रिसर्च चेयर स्कीम 2026 के तहत दुनिया भर की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी, रिसर्च लैब और वैज्ञानिक संस्थानों में कार्यरत भारतीय मूल के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों को भारत लौटकर शोध कार्य करने का आमंत्रण दिया है।

    इस योजना का उद्देश्य देश में विश्वस्तरीय रिसर्च इकोसिस्टम तैयार करना और भारत को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है।

    13 रणनीतिक क्षेत्रों पर रहेगा फोकस

    केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इस योजना के तहत 13 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें देश को वैश्विक नेतृत्व दिलाने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सुपरकंप्यूटिंग, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, साइबर सिक्योरिटी, हेल्थकेयर, बायोटेक्नोलॉजी, स्पेस और डिफेंस, एडवांस्ड मटेरियल्स, न्यूक्लियर एनर्जी, क्लाइमेट चेंज, मैन्युफैक्चरिंग 4.0, कृषि एवं फूड टेक्नोलॉजी तथा ब्लू इकोनॉमी जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

    सात प्रमुख संस्थानों को मिली जिम्मेदारी

    इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को लागू करने के लिए देश के सात प्रमुख संस्थानों को चुना गया है। इनमें IIT दिल्ली, IIT बॉम्बे, IIT मद्रास, IIT कानपुर, IIT हैदराबाद, IIT (ISM) धनबाद और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु शामिल हैं।

    ये संस्थान विदेशों से लौटने वाले शोधकर्ताओं को आधुनिक रिसर्च सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।

    पांच वर्षों में 200 करोड़ रुपये का बजट

    सरकार ने इस योजना के लिए वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक कुल 200 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है।

    योजना के तहत तीन श्रेणियों में वित्तीय सहायता दी जाएगी—

    • यंग रिसर्च फेलो (YRF) को अधिकतम 4 करोड़ रुपये
    • सीनियर रिसर्च फेलो (SRF) को 6.5 करोड़ रुपये
    • रिसर्च चेयर (RC) को 14 करोड़ रुपये तक का पैकेज मिलेगा।

    इन पैकेजों में रिसर्च ग्रांट, फेलोशिप, स्थानांतरण खर्च और संस्थागत सहायता भी शामिल होगी।

    क्यों जरूरी है यह पहल?

    हाल ही में प्रकाशित विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों से निकलने वाले बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली छात्र विदेशों में बस जाते हैं।

    एक अध्ययन के मुताबिक 1990 से 2020 के बीच IIT के शीर्ष रैंक हासिल करने वाले लगभग 74 प्रतिशत छात्र विदेशों में स्थायी रूप से बस गए, जबकि 2011-2020 के दौरान यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक पहुंच गया। इनमें से आधे से अधिक अमेरिका में कार्यरत हैं।

    नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि यदि इस प्रतिभा पलायन को नहीं रोका गया तो भारत अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पाएगा।

    विशेषज्ञों ने बताया सही दिशा में कदम

    स्टार्टअप उद्यमी और निवेशक डॉ. रितेश मलिक ने इस योजना को भारत के वैज्ञानिक भविष्य के लिए बड़ा कदम बताते हुए कहा कि चुने गए सभी 13 क्षेत्र देश की आत्मनिर्भरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

    हालांकि कई विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि केवल आर्थिक पैकेज पर्याप्त नहीं होंगे। लौटने वाले वैज्ञानिकों को विश्वस्तरीय प्रयोगशालाएं, तेज प्रशासनिक प्रक्रियाएं, रिसर्च की स्वतंत्रता और बेहतर जीवन-स्तर उपलब्ध कराना भी जरूरी होगा।

    वैश्विक परिस्थितियां भी बन सकती हैं अवसर

    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में कड़े वीजा नियम, बढ़ती लागत, रोजगार की अनिश्चितता और एआई के कारण बदलते रोजगार बाजार की स्थिति भारत के लिए अवसर बन सकती है।

    ऐसे समय में यदि सरकार बेहतर रिसर्च वातावरण उपलब्ध करा पाती है तो बड़ी संख्या में भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ भारत लौटने पर विचार कर सकते हैं।

    क्रियान्वयन पर रहेगी सबसे बड़ी परीक्षा

    हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता पूरी तरह इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यदि नौकरशाही, फंड जारी होने में देरी और रिसर्च संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया तो यह पहल भारत में ‘रिवर्स ब्रेन ड्रेन’ की दिशा में ऐतिहासिक साबित हो सकती है।

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