ईरान में इस वर्ष मुहर्रम और आशूरा का पर्व गहरे शोक और भावनात्मक माहौल में मनाया गया। लाखों लोगों ने काले वस्त्र पहनकर तीसरे शिया इमाम हजरत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को याद किया। इस बार हालिया युद्ध में जान गंवाने वाले सैन्य अधिकारियों, नेताओं और आम नागरिकों को भी श्रद्धांजलि दी गई, जिससे मुहर्रम का मातम पहले की तुलना में और अधिक भावुक बन गया।
युद्ध के बाद पहला मुहर्रम
इस वर्ष का मुहर्रम ऐसे समय आया जब हाल के अमेरिका-इजराइल हमलों के बाद पूरा देश अभी भी शोक और तनाव के दौर से गुजर रहा है। युद्ध में बड़ी संख्या में ईरानी सैन्य अधिकारियों, नेताओं और नागरिकों की मौत हुई थी।
इसी वजह से इस बार मातमी सभाओं और जुलूसों में कर्बला के शहीदों के साथ-साथ युद्ध में मारे गए लोगों को भी याद किया गया।
आशूरा पर निकले विशाल मातमी जुलूस
मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा के अवसर पर पूरे ईरान में लाखों लोग सड़कों पर उतरे। लोगों ने सीना पीटकर मातम किया, नौहे पढ़े और “या हुसैन” के नारों के साथ इमाम हुसैन की शहादत को याद किया।
देश के लगभग सभी शहरों और गांवों में बड़े पैमाने पर मातमी जुलूस निकाले गए, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
क्यों खास है आशूरा?
आशूरा का दिन वर्ष 680 ईस्वी में हुई कर्बला की ऐतिहासिक लड़ाई की याद में मनाया जाता है।
इसी दिन पैगंबर मोहम्मद के नवासे और शिया मुस्लिमों के तीसरे इमाम हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ शहीद हुए थे। उन्होंने उमय्यद शासक यजीद की सेना के सामने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे।
इमाम हुसैन की शहादत को आज भी सत्य, न्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
‘नज़री’ बांटकर दी सेवा और इंसानियत की सीख
मुहर्रम के दौरान पूरे ईरान में लोगों ने ‘नज़री’ के रूप में मुफ्त भोजन वितरित किया।
यह भोजन मातम में शामिल लोगों और जरूरतमंदों को कराया गया। इसे इमाम हुसैन की सेवा, करुणा और इंसानियत की शिक्षाओं का प्रतीक माना जाता है।
तासुआ पर हजरत अब्बास को किया याद
आशूरा से एक दिन पहले तासुआ मनाया गया।
इस दिन इमाम हुसैन के सौतेले भाई हजरत अब्बास को श्रद्धांजलि दी गई, जिन्होंने कर्बला में प्यासे बच्चों और महिलाओं के लिए पानी लाने की कोशिश करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी।
तासुआ के अवसर पर भी पूरे ईरान में विशेष धार्मिक कार्यक्रम और मातमी सभाएं आयोजित की गईं।
कर्बला पहुंचे लाखों जायरीन
ईरान ही नहीं, दुनिया भर के शिया मुसलमानों ने मुहर्रम और आशूरा के अवसर पर शोक सभाएं आयोजित कीं।
वहीं ईरान सहित कई देशों से लाखों जायरीन इराक के पवित्र शहर कर्बला पहुंचे, जहां उन्होंने इमाम हुसैन और उनके साथियों की दरगाह पर श्रद्धांजलि अर्पित की।
शहादत और संघर्ष का संदेश
इस वर्ष का मुहर्रम केवल कर्बला की ऐतिहासिक शहादत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हालिया युद्ध में जान गंवाने वालों की स्मृति भी इससे जुड़ गई।
धार्मिक विद्वानों ने कहा कि इमाम हुसैन का संदेश आज भी अन्याय, अत्याचार और हिंसा के खिलाफ डटकर खड़े होने की प्रेरणा देता है। इसी संदेश के साथ ईरान में इस वर्ष मुहर्रम और आशूरा श्रद्धा, शोक और एकजुटता के माहौल में संपन्न हुआ।








