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  • 59 साल पुराना जमीन विवाद खत्म, सुप्रीम कोर्ट ने चार पीढ़ियों से चल रही कानूनी लड़ाई पर लगाया विराम

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    सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के एक गांव में 15.5 बीघा जमीन को लेकर करीब छह दशक से चल रहे विवाद पर अंतिम फैसला सुनाते हुए चार पीढ़ियों से जारी कानूनी लड़ाई का अंत कर दिया। शीर्ष अदालत ने 4 जून 1957 की पंजीकृत बिक्री विलेख (सेल डीड) को वैध ठहराते हुए निचली अदालतों और हाई कोर्ट के फैसलों को पलट दिया।

    न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि इतने वर्षों तक चले इस विवाद को अब समाप्त किया जाना चाहिए।

    क्या था पूरा मामला?

    यह विवाद हरिद्वार के नरसिंहपुर कलां गांव की 15.5 बीघा जमीन से जुड़ा था। वर्ष 1957 में अपीलकर्ताओं के पूर्वजों ने, जो उस समय नाबालिग थे, पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से यह जमीन खरीदी थी।

    अपीलकर्ताओं का दावा था कि खरीद के बाद से वे लगातार इस भूमि पर कब्जे में रहे।

    1984 में हुआ नामांतरण

    वर्ष 1984 में विक्रेताओं में से एक द्वारा आपत्ति वापस लेने के बाद जमीन का नामांतरण (म्यूटेशन) खरीदारों के पक्ष में कर दिया गया।

    बाद में 1991 में चकबंदी (कंसोलिडेशन) की कार्यवाही के दौरान उन्होंने भूमिधर अधिकारों की मांग की। प्रारंभिक स्तर पर उनका दावा स्वीकार भी किया गया और 1993 में हुए समझौते में भी उनके कब्जे को मान्यता मिली।

    लेकिन बाद में अन्य सह-भूधारकों की आपत्तियों के बाद मामला दोबारा खोला गया।

    निचली अदालतों ने खारिज कर दिया था दावा

    1999 में चकबंदी अधिकारी ने अपीलकर्ताओं का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि बिक्री विलेख विधिवत सिद्ध नहीं किया गया और यह उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 154 का उल्लंघन करता है।

    इसके बाद अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकारियों ने भी यही फैसला बरकरार रखा। अंततः 2017 में हाई कोर्ट ने भी अपीलकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

    सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाई कोर्ट और चकबंदी अधिकारियों ने 1957 की पंजीकृत बिक्री विलेख को अवैध मानने में गंभीर कानूनी त्रुटि की।

    अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में कहीं भी यह आरोप नहीं है कि बिक्री विलेख फर्जी था, धोखाधड़ी से तैयार किया गया था, दबाव में हस्ताक्षर कराए गए थे या प्रतिरूपण (इम्पर्सनेशन) हुआ था।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी या मामूली विसंगतियों के आधार पर किसी पंजीकृत बिक्री विलेख को खारिज नहीं किया जा सकता।

    गवाह के पते की विसंगति को नहीं माना आधार

    निचली अदालतों ने गवाह के पते में अंतर को आधार बनाकर बिक्री विलेख को संदेहास्पद माना था।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की छोटी तकनीकी विसंगतियां किसी पंजीकृत दस्तावेज की वैधता समाप्त नहीं कर सकतीं, विशेष रूप से तब जब उसके फर्जी होने या धोखाधड़ी से तैयार होने का कोई आरोप ही नहीं लगाया गया हो।

    कब्जे के दावे को भी मिला समर्थन

    शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता लगातार भूमि पर अपने कब्जे का दावा करते रहे और प्रतिवादियों की ओर से इस दावे का प्रभावी खंडन भी नहीं किया गया।

    कोर्ट ने कहा कि पंजीकृत बिक्री विलेख, उसके पक्ष में मौजूद कानूनी अनुमान, धोखाधड़ी या जालसाजी के आरोपों का अभाव तथा गवाह की गवाही में कोई ठोस विरोधाभास न होना यह साबित करता है कि निचली अदालतों के निष्कर्ष टिकाऊ नहीं थे।

    चार पीढ़ियों तक चला मुकदमा

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि जो मामला शुरुआत में केवल नामांतरण की कार्यवाही के रूप में शुरू हुआ था, वह समय के साथ कई कानूनी मंचों से गुजरता हुआ सात दशक लंबी न्यायिक प्रक्रिया में बदल गया।

    अदालत ने कहा कि यह मुकदमा चार पीढ़ियों तक चलता रहा और अंततः सर्वोच्च न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप कर विवाद का अंतिम समाधान करना पड़ा।

    इस फैसले के साथ हरिद्वार की इस ऐतिहासिक भूमि विवाद पर करीब 59 वर्षों से चली आ रही कानूनी लड़ाई का आखिरकार अंत हो गया।

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