लोकसभा चुनाव 2024 के बाद कांग्रेस संगठन में लगातार बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। राहुल गांधी पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर एक पुराना सवाल फिर से चर्चा में है—क्या राहुल गांधी अपने ही पुराने और अनुभवी कांग्रेस नेताओं से ज्यादा भरोसा उन लोगों पर करते हैं जो पार्टी की पारंपरिक संरचना से बाहर रहे हैं?
उत्तर प्रदेश के लिए पूर्व आम आदमी पार्टी नेता और दलित चेहरे राजेंद्र पाल गौतम को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) का प्रभारी बनाए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि राहुल गांधी की बदलती राजनीतिक सोच और कांग्रेस के भविष्य की दिशा का संकेत भी है।
उत्तर प्रदेश में बड़ा संदेश
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए हमेशा सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में रहा है। यही वह राज्य है जहां से कांग्रेस ने राष्ट्रीय राजनीति में अपना सबसे मजबूत आधार बनाया था। लेकिन पिछले कई दशकों से पार्टी यहां लगातार कमजोर होती चली गई।
ऐसे राज्य की जिम्मेदारी किसी पारंपरिक कांग्रेसी नेता की बजाय राजेंद्र पाल गौतम जैसे हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए नेता को सौंपना कई सवाल खड़े करता है।
राजेंद्र पाल गौतम दलित राजनीति में सक्रिय चेहरा रहे हैं और पहले आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता रह चुके हैं। कांग्रेस में आने के बाद उन्हें अनुसूचित जाति विभाग की जिम्मेदारी भी दी गई थी। अब उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राजनीतिक राज्य का संगठनात्मक दायित्व सौंपना राहुल गांधी की सामाजिक न्याय आधारित राजनीति को आगे बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
आखिर राहुल गांधी ‘आउटसाइडर्स’ पर क्यों करते हैं भरोसा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी लंबे समय से कांग्रेस की पारंपरिक कार्यप्रणाली से असहज रहे हैं।
उनका मानना है कि कांग्रेस की पुरानी संरचना में कई ऐसे नेता मौजूद हैं जिन्होंने वर्षों तक सत्ता और संगठन दोनों का लाभ उठाया, लेकिन पार्टी के पुनर्निर्माण में अपेक्षित योगदान नहीं दिया। यही कारण है कि राहुल गांधी ऐसे लोगों को आगे बढ़ाना चाहते हैं जो पारंपरिक गुटबाजी और संगठनात्मक राजनीति से अलग हों।
राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले कई चेहरे इसी सोच का हिस्सा माने जाते हैं।
इनमें पूर्व IAS अधिकारी ससिकांत सेंथिल, संगठन विशेषज्ञ सचिन राव, कृष्णा अल्लावरू, पूर्व नौकरशाह के. राजू, डेटा विशेषज्ञ प्रवीण चक्रवर्ती, अलंकार सवाई, के.बी. बिजू और लंबे समय से उनके करीबी सहयोगी कनिष्क सिंह जैसे नाम शामिल हैं।
इनमें से कई नेताओं की पहचान कांग्रेस की पारंपरिक राजनीति से नहीं, बल्कि पेशेवर, प्रशासनिक या सामाजिक पृष्ठभूमि से रही है।
कांग्रेस के पुराने नेताओं की नाराजगी
राहुल गांधी की इसी कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष भी मौजूद है।
कई वरिष्ठ और जमीनी कांग्रेस नेताओं का मानना है कि जिन्होंने पार्टी के कठिन दौर में संगठन नहीं छोड़ा, चुनावी हार झेली, प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई का सामना किया और लगातार कांग्रेस के साथ खड़े रहे, उन्हें उचित महत्व नहीं मिल रहा।
उनका आरोप है कि जब संगठन में बड़े पद, राज्यसभा की सीटें या चुनावी जिम्मेदारियां बांटी जाती हैं तो नए चेहरे या राहुल गांधी के निजी भरोसेमंद लोगों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि पुराने कार्यकर्ता और नेता पीछे छूट जाते हैं।
सामाजिक न्याय की राजनीति पर जोर
राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से सामाजिक न्याय, जातीय प्रतिनिधित्व और संविधान बचाओ जैसे मुद्दों को अपनी राजनीति का केंद्र बना चुके हैं।
राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस अब दलित, पिछड़े, आदिवासी और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
पार्टी का मानना है कि पारंपरिक नेतृत्व के बजाय नए सामाजिक चेहरों को आगे लाकर भाजपा की सामाजिक समीकरण वाली राजनीति का मुकाबला किया जा सकता है।
क्या यह रणनीति सफल होगी?
हालांकि, कई राजनीतिक विशेषज्ञ राहुल गांधी की इस रणनीति को जोखिम भरी भी मानते हैं।
उनका कहना है कि संगठन केवल वैचारिक राजनीति या नए चेहरों के सहारे नहीं चलता। किसी भी राज्य में चुनाव जीतने के लिए स्थानीय संगठन, जिला स्तर के नेता, ब्लॉक इकाइयां और वर्षों से काम कर रहे कार्यकर्ताओं का नेटवर्क भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
ऐसे में यदि नए नेताओं के पास संगठनात्मक जड़ें मजबूत नहीं होंगी तो चुनावी स्तर पर इसका नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
राहुल गांधी फिलहाल कांग्रेस को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी राजनीति युवाओं, सामाजिक न्याय, नए नेतृत्व और वैचारिक संघर्ष पर आधारित दिखाई देती है।
लेकिन पार्टी के भीतर सबसे बड़ी चुनौती यही बनी हुई है कि क्या वे नए और पुराने नेतृत्व के बीच संतुलन बना पाएंगे?
यदि वे केवल अपने भरोसेमंद नए चेहरों पर निर्भर रहते हैं तो पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी बढ़ सकती है। वहीं यदि पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह बनाए रखते हैं तो संगठन में बदलाव की उनकी कोशिश कमजोर पड़ सकती है।
आगे क्या?
उत्तर प्रदेश में राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति को कांग्रेस के लिए एक प्रयोग माना जा रहा है। यदि यह प्रयोग सफल होता है तो आने वाले समय में अन्य राज्यों में भी राहुल गांधी इसी मॉडल को अपनाते दिखाई दे सकते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि कांग्रेस संगठन में राहुल गांधी की नई कार्यशैली पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि यह “नई कांग्रेस” चुनावी मैदान में कितना असर दिखा पाती है।








