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  • वायनाड भूस्खलन बना बड़ा सवाल: क्या प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रशासनिक लापरवाही थी वजह?

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    केरल के वायनाड जिले में मंगलवार को हुए भीषण भूस्खलन ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआती जानकारी के अनुसार, इस हादसे में मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड के तीन प्रवासी मजदूरों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोग मलबे में फंस गए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि संवेदनशील पारिस्थितिकी वाले क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही, कमजोर पर्यावरणीय मूल्यांकन और सुरक्षा निर्देशों के प्रभावी पालन में कमी का परिणाम भी हो सकती है।

    वायनाड पश्चिमी घाट (Western Ghats) का हिस्सा है, जिसे भूस्खलन की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है। भू-वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने पहले भी इस क्षेत्र में बड़े निर्माण कार्यों को लेकर कई बार चेतावनी दी थी। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं, लेकिन परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) में इन जोखिमों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया।

    यह निर्माण परियोजना कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KRCL) द्वारा केरल इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (KIIFB) के माध्यम से संचालित की जा रही है, जबकि निर्माण कार्य की जिम्मेदारी दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड (DBL) के पास है। परियोजना की निगरानी लोक निर्माण विभाग (PWD) कर रहा है।

    हादसे के बाद निर्माण स्थल पर मिट्टी और खुदाई से निकले मलबे के प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठे हैं। आलोचकों का कहना है कि भारी मात्रा में खुदाई की गई मिट्टी को निर्माण स्थल के पास जमा किया गया था, जो लगातार बारिश के कारण अस्थिर होकर भूस्खलन का कारण बन सकती थी।

    हालांकि, दिलीप बिल्डकॉन ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि भूस्खलन जंगल क्षेत्र में हुआ और कंपनी ने सभी सुरक्षा मानकों का पालन किया था। दूसरी ओर, राज्य सरकार के अधिकारियों ने स्वीकार किया कि पहले के निरीक्षणों में निर्माण स्थल के पास बड़ी मात्रा में मिट्टी जमा होने की बात सामने आई थी। इसके बाद भारी बारिश के दौरान कार्य रोकने, मजदूरों को जोखिम वाले क्षेत्रों में तैनात न करने और जमा मिट्टी हटाने के निर्देश भी दिए गए थे।

    वायनाड की जिला कलेक्टर मेघा श्री ने बताया कि हादसे के समय कुल 15 मजदूर निर्माण स्थल पर मौजूद थे। प्रशासन का प्राथमिक उद्देश्य मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना है। उन्होंने कहा कि राहत एवं बचाव कार्य पूरा होने के बाद परियोजना से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण कार्यों की वैज्ञानिक निगरानी तथा मौसम संबंधी चेतावनियों के आधार पर समय पर काम रोकने जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाना आवश्यक है। उनका मानना है कि केवल राहत कार्यों से नहीं, बल्कि बेहतर योजना और जवाबदेही से ही ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।

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