भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को शुरुआती बढ़त के बाद अचानक गिरावट देखने को मिली। एक समय सेंसेक्स करीब 450 अंक तक चढ़ गया था, लेकिन दोपहर तक यह गिरकर लाल निशान में पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस उतार-चढ़ाव की एक बड़ी वजह हाल ही में लागू की गई नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (Closing Auction Session – CAS) प्रणाली है, जिसने ट्रेडर्स के बीच अनिश्चितता बढ़ा दी है।
क्या बदला है नई क्लोजिंग प्राइस प्रणाली में?
3 अगस्त 2026 से भारत में Closing Auction Session (CAS) लागू किया गया है।
पहले किसी शेयर का क्लोजिंग प्राइस बाजार बंद होने से पहले अंतिम 30 मिनट के कारोबार के वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) के आधार पर तय होता था।
नई व्यवस्था में फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) वाले शेयरों के लिए नियमित कारोबार समाप्त होने के बाद 20 मिनट का अलग क्लोजिंग ऑक्शन आयोजित किया जाता है। इस दौरान खरीद और बिक्री के ऑर्डर एकत्र किए जाते हैं और उनके आधार पर अंतिम क्लोजिंग प्राइस तय होती है।
ट्रेडर्स क्यों हैं परेशान?
नई प्रणाली में ट्रेडर्स को क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान कीमतों की पहले जैसी रियल-टाइम जानकारी नहीं मिलती। ऐसे में अंतिम क्लोजिंग प्राइस नियमित ट्रेडिंग के दौरान दिखाई देने वाली कीमत से काफी अलग हो सकती है।
इसका सबसे अधिक असर फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) कारोबार पर पड़ता है, क्योंकि इन कॉन्ट्रैक्ट्स का सेटलमेंट क्लोजिंग प्राइस के आधार पर होता है। अंतिम कीमत में मामूली बदलाव भी निवेशकों के मुनाफे या नुकसान को प्रभावित कर सकता है।
सेंसेक्स और निफ्टी में दिख रहा अंतर
नई व्यवस्था लागू होने के बाद निफ्टी 50 की क्लोजिंग कीमत अब ऑक्शन प्रक्रिया से प्रभावित हो रही है, जबकि बीएसई सेंसेक्स की क्लोजिंग अलग ऑर्डर बुक प्रणाली से तय होती है।
इस वजह से दोनों प्रमुख सूचकांकों के बीच असामान्य अंतर देखने को मिल रहा है, जिससे हेजिंग और डेरिवेटिव ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
आखिर क्यों लागू की गई नई व्यवस्था?
नई क्लोजिंग ऑक्शन प्रणाली का उद्देश्य बाजार में पारदर्शिता बढ़ाना और क्लोजिंग प्राइस को अधिक निष्पक्ष बनाना है। इसके जरिए अंतिम समय में कीमतों में कृत्रिम हेरफेर की संभावना को कम करने और भारतीय बाजार को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की कोशिश की गई है।
क्या आगे भी बनी रहेगी अस्थिरता?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती दिनों में इस नई प्रणाली के कारण उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, जैसे-जैसे निवेशक, ब्रोकर और संस्थागत प्रतिभागी इस व्यवस्था के अभ्यस्त होंगे, बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद है।
फिलहाल नियामक संस्थाओं की ओर से इस प्रणाली की तत्काल समीक्षा की कोई योजना नहीं है और उम्मीद जताई जा रही है कि समय के साथ बाजार नई व्यवस्था के अनुरूप स्वयं को ढाल लेगा।








