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  • ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार: रूस से तेल खरीद पर बोला- अमेरिका और यूरोप भी कर रहे व्यापार

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    रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक राजनीति और ऊर्जा व्यापार को लेकर तनाव गहराता जा रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया कि यूक्रेन युद्ध में अमेरिका सबसे बड़ा फंडर है और चीन जैसे देश रूस से ऊर्जा खरीद कर अप्रत्यक्ष रूप से मॉस्को का समर्थन कर रहे हैं। इस पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और साफ कहा है कि उसका व्यापार किसी तीसरे पक्ष को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं है।

    चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि बीजिंग की कार्रवाई किसी देश के खिलाफ नहीं है और इसे लेकर बाहरी दखलअंदाजी स्वीकार्य नहीं होगी। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि अमेरिका और यूरोपीय संघ खुद भी रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं, ऐसे में चीन पर आरोप लगाना उचित नहीं है। चीन ने यह भी दोहराया कि उसकी ऊर्जा और कच्चे तेल की जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और रूस से आयात इस आवश्यकता का हिस्सा है। बीजिंग ने कहा कि उसकी नीतियां तीसरे पक्ष को नुकसान पहुंचाने या अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अस्थिरता पैदा करने के लिए नहीं हैं।

    ट्रंप ने यूक्रेन युद्ध को लेकर बयान दिया कि अमेरिका ही यूक्रेन का सबसे बड़ा फंडर है। बाकी देश उतना योगदान नहीं दे रहे जितना करना चाहिए। ट्रंप ने चीन पर यह आरोप लगाया कि वह रूस से तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध को सहारा दे रहा है। उनका यह बयान अमेरिकी राजनीति में बहस का विषय बना हुआ है, खासकर राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर।

    ट्रंप के आरोपों का जवाब देते हुए चीन ने जोर दिया कि अमेरिका और यूरोप अभी भी मॉस्को के साथ कई स्तरों पर व्यापार कर रहे हैं। यूरोप ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन ऊर्जा निर्भरता के कारण कई यूरोपीय देश रूस से LNG और अन्य संसाधन खरीद रहे हैं। अमेरिका ने भी हाल के वर्षों में रूस से व्यापारिक गतिविधियां जारी रखी हैं। चीन ने कहा कि जब आप खुद व्यापार कर रहे हैं, तो दूसरों पर आरोप कैसे लगा सकते हैं।

    रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। तेल और गैस की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव हो रहा है और इसका सीधा असर विकासशील देशों पर पड़ रहा है। भारत और चीन जैसे देशों ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए रूस से सस्ते दामों पर ऊर्जा आयात बढ़ा दिया है, जबकि यूरोप नए ऊर्जा स्रोत तलाशने में जुटा है।

    यूक्रेन लगातार पश्चिमी देशों से ज्यादा समर्थन की मांग कर रहा है। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भारत और चीन जैसे देशों से अपील की है कि वे रूस से दूरी बनाएं। उनका कहना है कि यदि रूस की ऊर्जा आपूर्ति पर और दबाव बनाया गया तो युद्ध जल्द खत्म हो सकता है।

    ट्रंप के आरोप और चीन की प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया है कि रूस-यूक्रेन युद्ध केवल दो देशों का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बन चुका है। अमेरिका और यूरोप जहां रूस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं चीन और भारत जैसे देश अपने ऊर्जा हित साध रहे हैं। यह खिंचातानी आने वाले महीनों में और बढ़ सकती है और दुनिया की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करती रह सकती है।

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