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  • “न्याय का मंदिर बनाएं, 7 स्टार होटल नहीं” — मुंबई में नए हाईकोर्ट भवन के शिलान्यास पर बोले CJI बी. आर. गवई

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    देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर आसीन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी. आर. गवई ने गुरुवार को मुंबई में आयोजित एक विशेष समारोह में नए बॉम्बे हाईकोर्ट भवन के भूमिपूजन और शिलान्यास के दौरान न्याय के प्रति अपनी स्पष्ट और सरल सोच का परिचय दिया। उन्होंने समारोह में मौजूद आर्किटेक्ट्स और अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा — “यह भवन न्याय का मंदिर होना चाहिए, न कि सात सितारा होटल।”

    बी. आर. गवई का यह बयान न्यायिक भवनों के निर्माण में सादगी और गरिमा के प्रतीक के रूप में सामने आया है। उन्होंने कहा कि न्यायालय की इमारतें सिर्फ दीवारें और कमरे नहीं होतीं, बल्कि वे उस न्याय-व्यवस्था का प्रतीक होती हैं जिस पर देश के नागरिक भरोसा करते हैं। इसलिए इन भवनों में दिखावे की बजाय गंभीरता, सादगी और गरिमा झलकनी चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “जब कोई नागरिक अदालत के दरवाजे पर आता है, तो वह वहां किसी सुविधा के लिए नहीं बल्कि न्याय पाने के लिए आता है। ऐसे में न्यायालय की इमारत में भव्यता की बजाय विनम्रता और गरिमा झलकनी चाहिए। हमें ऐसा भवन बनाना है जो आम आदमी को यह एहसास दिलाए कि यह जगह न्याय की है, विलासिता की नहीं।”

    मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) में बनने वाला नया बॉम्बे हाईकोर्ट भवन लगभग 30 एकड़ में फैलेगा। इसमें न्यायाधीशों, वकीलों और वादियों के लिए आधुनिक सुविधाएं होंगी, लेकिन साथ ही इसे ऊर्जा-संरक्षण और पर्यावरण के अनुकूल भी बनाया जाएगा। सीजेआई गवई ने कहा कि तकनीकी और वास्तु दृष्टि से आधुनिकता जरूरी है, परंतु इसका अर्थ विलासिता नहीं होना चाहिए।

    समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार भी मौजूद थे। मुख्यमंत्री शिंदे ने कहा कि मुंबई का नया हाईकोर्ट भवन राज्य की न्याय व्यवस्था के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि “न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है, और इस स्तंभ को मजबूत करने के लिए बुनियादी ढांचे का सुदृढ़ होना उतना ही जरूरी है।”

    फडणवीस ने भी सीजेआई की सोच की सराहना करते हुए कहा कि “सीजेआई गवई की यह बात हम सभी के लिए प्रेरणा है कि किसी भी सरकारी भवन का उद्देश्य जनता की सेवा होना चाहिए, न कि दिखावे का प्रतीक बनना।”

    मुख्य न्यायाधीश गवई ने आगे कहा कि उन्होंने महाराष्ट्र के कई जिलों में जाकर न्यायालयों की स्थिति देखी है। कई जगहों पर न्यायाधीशों और कर्मचारियों को असुविधा होती है, लेकिन वे फिर भी अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि “न्यायपालिका का सबसे बड़ा बल उसकी निष्ठा है। अगर हम उसी भावना को अपने भवनों में भी उतार सकें, तो हम सच्चे अर्थों में न्याय का मंदिर बना पाएंगे।”

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को आम नागरिकों के लिए अधिक सुगम और सुलभ बनाना ही असली लक्ष्य होना चाहिए। उन्होंने कहा, “भवन चाहे कितना भी सुंदर हो, अगर उसमें न्याय जल्दी और निष्पक्षता से नहीं मिलता, तो उसका कोई अर्थ नहीं।”

    सीजेआई गवई का यह संदेश न केवल आर्किटेक्ट्स के लिए बल्कि पूरे न्यायिक समुदाय के लिए एक विचारणीय दिशा है। आज जब देशभर में न्यायालय भवनों के आधुनिकीकरण की चर्चा चल रही है, तब उनका यह वक्तव्य सादगी, संवेदनशीलता और मूल न्यायिक मूल्यों की याद दिलाता है।

    बॉम्बे हाईकोर्ट का नया भवन महाराष्ट्र की न्याय प्रणाली के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने जा रहा है। लेकिन CJI गवई के शब्दों ने यह सुनिश्चित किया है कि यह भवन केवल “ढांचा” न रह जाए, बल्कि न्याय के प्रति जनता के विश्वास का जीवंत प्रतीक बने।

    मुख्य न्यायाधीश के इन शब्दों के साथ समारोह का समापन हुआ, और वहां मौजूद सभी लोगों ने एक सुर में यही कहा कि न्याय का मंदिर वही होता है, जहाँ हर व्यक्ति को समान अवसर और निष्पक्ष सुनवाई मिले — चाहे वह कितना भी बड़ा या छोटा क्यों न हो।

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