बिहार की राजनीति में एक बार फिर इतिहास रचते हुए जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक नया मुकाम हासिल कर लिया है। नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और अब वे भारत के उन गिने-चुने नेताओं की श्रेणी में पहुंच रहे हैं जिन्होंने लंबे समय तक निरंतर सत्ता संभाली है। उनके नाम पहले से ही बिहार के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड दर्ज है, लेकिन अब वे राष्ट्रीय रिकॉर्ड की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे पाने के लिए उन्हें पवन चामलिंग और नवीन पटनायक जैसे दिग्गजों के स्तर की दीर्घकालिक जनविश्वास की आवश्यकता होगी।
नीतीश कुमार अब तक 19 साल 93 दिन तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं। यदि राजनीतिक परिस्थितियां स्थिर रहीं और वे आगामी वर्षों में भी सत्ता में बने रहते हैं, तो वर्ष 2030 तक उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 24 वर्ष से अधिक का हो जाएगा। इससे वे देश के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में पहले या दूसरे स्थान पर पहुंच सकते हैं। फिलहाल यह रिकॉर्ड सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग के नाम है, जिनका कार्यकाल लगभग 24 वर्ष 165 दिन रहा। इस सूची में दूसरे स्थान पर पूर्व ओडिशा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हैं, जिन्होंने 24 साल 99 दिन तक राज्य की सत्ता संभाली। पश्चिम बंगाल के ज्योति बसु भी 23 साल 137 दिन तक मुख्यमंत्री रहे।
पवन चामलिंग और नवीन पटनायक जैसे नेताओं ने अपने काम, विकास और जनआकांक्षाओं को पूरा कर लंबे समय तक जनता का विश्वास जीता। इन नेताओं को सत्ता विरोधी लहर का सामना शायद ही कभी करना पड़ा, क्योंकि इनके शासन में लोगों को स्थिरता, सुविधा और भरोसा मिला। यही कारण है कि वे लगातार चुनाव जीतते रहे। नीतीश कुमार ने भी सुशासन को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया है और इसी आधार पर वे कई बार सत्ता में लौटे हैं। बिहार में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था को सुधारने के प्रयासों ने उन्हें “सुशासन बाबू” की पहचान दी।
अगर पवन चामलिंग की राजनीतिक यात्रा की बात करें, तो उनका सफर बेहद दिलचस्प रहा है। राजनीति में उनका प्रवेश धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ते हुए हुआ। 1982 में वे ग्राम पंचायत अध्यक्ष चुने गए और 1985 में पहली बार विधायक बने। दोबारा विधायक बनने पर वे मंत्री बने और 1993 में उन्होंने अपनी पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) की स्थापना की। 1994 के विधानसभा चुनावों में एसडीएफ को बहुमत मिला और वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने लगातार चुनाव जीतकर 2019 तक का सफर पूरा किया। भ्रष्टाचार के आरोपों जैसे कठिन चुनौतियों के बावजूद चामलिंग की लोकप्रियता बनी रही और वे लगातार जनता का समर्थन लेते रहे।
नवीन पटनायक का कार्यकाल भी इसी प्रकार स्थिरता और विकास की राजनीति पर आधारित रहा। ओडिशा में प्राकृतिक आपदाओं और आर्थिक कमजोरियों के बावजूद उन्होंने राज्य को नई दिशा देने का प्रयास किया। उनका सरल स्वभाव, भाषणों में कम बोलना और काम पर अधिक ध्यान देना उनकी सफलता का कारण माना जाता है।
नीतीश कुमार की स्थिति इन दोनों दिग्गज नेताओं से अलग भी है और कुछ हद तक समान भी। राजनीतिक गठबंधनों में उतार-चढ़ाव के बावजूद उन्होंने प्रशासनिक सुधार, कानून-व्यवस्था और सामाजिक कल्याण योजनाओं के आधार पर बिहार की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखी है। हालांकि, राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाने के लिए उन्हें राजनीतिक स्थिरता और जनविश्वास का वही स्तर हासिल करना होगा जो चामलिंग और पटनायक जैसे नेताओं के पास था।
भारत की राजनीति में ऐसे लंबे कार्यकाल बहुत कम देखने को मिलते हैं। नीतीश कुमार का यह सफर न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बनने की ओर बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में वे इस रिकॉर्ड को हासिल कर पाते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उनकी नीतियां और शासन जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है।








