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  • सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: केवल पंजीकृत वसीयत के आधार पर भूमि नामांतरण से इनकार नहीं किया जा सकता, राजस्व अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश

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    जमीन और संपत्ति से जुड़े मामलों में आम नागरिकों को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और स्पष्ट निर्णय सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि केवल इस आधार पर कि दावा पंजीकृत वसीयत (Registered Will) पर आधारित है, भूमि के नामांतरण या वारिसी प्रविष्टि (Mutation Entry) से इनकार नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन लाखों मामलों पर असर डालेगा, जहां वर्षों से राजस्व अधिकारी वसीयत के आधार पर नामांतरण करने से बचते रहे हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि राजस्व रिकॉर्ड का उद्देश्य स्वामित्व का अंतिम निर्धारण नहीं, बल्कि कर निर्धारण और प्रशासनिक सुविधा है। ऐसे में वसीयत के आधार पर दाखिल आवेदन को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करना कानूनन गलत है।

    यह मामला मध्य प्रदेश के एक ग्रामीण क्षेत्र की कृषि भूमि से संबंधित था। जमीन के मूल मालिक रोडा उर्फ रोडीलाल का वर्ष 2019 में निधन हो गया था। मृत्यु से पहले उन्होंने वर्ष 2017 में अपनी संपत्ति को लेकर एक पंजीकृत वसीयत तैयार की थी। इस वसीयत के आधार पर ताराचंद्र नामक व्यक्ति ने जमीन पर अपना अधिकार जताया और राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण के लिए आवेदन किया।

    प्रारंभिक स्तर पर राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि की गई, लेकिन बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह कहते हुए नामांतरण रद्द कर दिया कि केवल वसीयत के आधार पर भूमि की वारिसी दर्ज नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

    इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने की। अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि—

    • वसीयत संपत्ति हस्तांतरण का एक मान्य और वैध कानूनी माध्यम है।

    • राजस्व अधिकारी यह तय नहीं कर सकते कि वसीयत सही है या गलत।

    • यदि वसीयत की वैधता पर विवाद है, तो उसका निपटारा सिविल कोर्ट में होगा, न कि तहसील या कलेक्टर कार्यालय में।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नामांतरण प्रविष्टि करने से किसी को स्वामित्व का अंतिम अधिकार नहीं मिल जाता, बल्कि यह केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड होता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 109 और 110 का हवाला दिया। इन धाराओं के अनुसार, भूमि अधिकार कई वैध तरीकों से प्राप्त किए जा सकते हैं, जिनमें—

    • बिक्री विलेख

    • उपहार पत्र

    • उत्तराधिकार

    • और वसीयत (Will)

    शामिल हैं। अदालत ने यह भी कहा कि 2017 में लागू नियमों में वसीयत को स्पष्ट रूप से नामांतरण के लिए मान्य दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया गया है।

    इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने राजस्व प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया है कि—

    • वसीयत के आधार पर दायर नामांतरण आवेदन को सिर्फ अनुमान या संदेह के आधार पर खारिज न किया जाए।

    • वसीयत की वैधता तय करना राजस्व अधिकारियों का अधिकार क्षेत्र नहीं है।

    • यदि भविष्य में सिविल कोर्ट द्वारा स्वामित्व को लेकर कोई अलग निर्णय आता है, तो राजस्व रिकॉर्ड को उस निर्णय के अनुसार संशोधित किया जा सकता है।

    इससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि राजस्व रिकॉर्ड अंतिम सबूत (Conclusive Proof) नहीं होते।

    इस निर्णय का सबसे बड़ा फायदा आम जमीन मालिकों और वारिसों को मिलेगा। अब—

    • वसीयत होने पर नामांतरण के लिए वर्षों तक भटकना नहीं पड़ेगा।

    • राजस्व कार्यालयों में होने वाली अनावश्यक देरी और भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी।

    • संपत्ति विवादों में कानूनी प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और सरल होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में संपत्ति विवादों को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा।

    कानून विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय संपत्ति कानून की व्याख्या को और मजबूत करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि राजस्व रिकॉर्ड का दायरा सीमित है, और असली अधिकार तय करने का काम केवल सिविल कोर्ट का है।

    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जमीन और संपत्ति से जुड़े मामलों में एक मील का पत्थर साबित होगा। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पंजीकृत वसीयत के आधार पर भूमि नामांतरण से इनकार करना अवैध है। यह निर्णय न केवल कानून की सही व्याख्या करता है, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों की भी रक्षा करता है।

    आने वाले समय में यह फैसला देशभर की राजस्व और न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

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