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  • मैनपुरी में वफादारी की मिसाल बने राधेश्याम यादव

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    हरिओम | समाचार वाणी न्यूज़
    समाजवाद के गढ़ मैनपुरी से वफादारी, समर्पण और वैचारिक अटूटता की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। भोगांव क्षेत्र के ग्राम महोली खेड़ा निवासी समाजवादी पार्टी के पुराने सिपाही राधेश्याम यादव भले ही अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन अपनी अंतिम इच्छा के माध्यम से उन्होंने समाजवादी विचारधारा के प्रति अपनी अटूट निष्ठा को अमर कर दिया।

    मृत्यु से पहले लिखी अंतिम वसीयत

    राधेश्याम यादव ने अपने जीवनकाल में ही अपनी अंतिम यात्रा को लेकर एक स्पष्ट इच्छा जताई थी। उन्होंने एक सफेद कपड़े पर अपने हाथों से अपनी ‘अंतिम वसीयत’ लिखी थी, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था—
    “अंतिम यात्रा का प्रयास हो, कोई भी सीजन हो, एक लाल टोपी तथा पार्टी के झंडे को शव के ऊपर डालकर यात्रा निकालनी चाहिए।”

    हैरत की बात यह रही कि इस कपड़े पर उन्होंने 7 जून 2024 (शुक्रवार) की तारीख के साथ अपने हस्ताक्षर भी किए थे, मानो यह कोई विधिवत कानूनी दस्तावेज हो।

    परिजनों ने निभाई आखिरी इच्छा

    राधेश्याम यादव के निधन के बाद उनके परिजनों ने उनकी इस अंतिम इच्छा को आदेश की तरह स्वीकार किया। उनके पार्थिव शरीर को समाजवादी पार्टी के लाल-हरे झंडे में लपेटा गया और सिर पर वही लाल टोपी सजाई गई, जो उनके जीवन भर के संघर्ष और पहचान का प्रतीक रही।

    पार्टी से जीवनभर जुड़ा रहा नाता

    राधेश्याम यादव के भांजे प्रदीप यादव ने बताया कि उनके मामा समाजवादी पार्टी की स्थापना के समय से ही संगठन से जुड़े रहे और अंतिम सांस तक उनकी निष्ठा कभी नहीं डगमगाई। उन्होंने कहा कि राजनीति उनके लिए पद या लाभ का माध्यम नहीं, बल्कि विचार और संघर्ष का रास्ता थी।

    भावुक कर देने वाली अंतिम यात्रा

    जब भोगांव के महोली खेड़ा गांव में उनकी अंतिम यात्रा निकली, तो माहौल गमगीन हो गया। स्थानीय लोगों की आंखें नम थीं। ग्रामीणों का कहना है कि नेताजी मुलायम सिंह यादव के दौर के कार्यकर्ता इसी तरह की सच्ची प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं।

    झंडा बना कफन, विचार बना पहचान

    राधेश्याम यादव ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए समाजवादी झंडा महज़ एक कपड़ा नहीं था, बल्कि वही उनका कफन, उनकी पहचान और उनका जीवन दर्शन था। उनकी यह विदाई समाजवादी आंदोलन के इतिहास में एक भावनात्मक और प्रेरणादायी अध्याय बनकर दर्ज हो गई।

     

     

     

     

     

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