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  • ‘आखिर लादेन पाकिस्तान में क्यों छिपा था?’ ऑपरेशन सिंदूर पर एस. जयशंकर ने यूरोप को दी दो टूक नसीहत।

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    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत के ऑपरेशन सिंदूर को यूरोप द्वारा दो देशों के संघर्ष के रूप में दिखाना विदेश मंत्री को नागवार गुज़रा। उन्होंने इसे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई बताया।

    नई दिल्ली, 11 जून 2025: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूरोप को कड़ी नसीहत देते हुए कहा है कि भारत की पाकिस्तान के खिलाफ की गई आतंकवाद विरोधी कार्रवाई को दो देशों के संघर्ष की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
    वे फिलहाल यूरोपियन यूनियन (EU) के नेताओं से मुलाकात के लिए ब्रुसेल्स में हैं, जहां उन्होंने यूरोपीय मीडिया से बात करते हुए ऑपरेशन सिंदूर, ओसामा बिन लादेन, और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारत का पक्ष साफ किया।

    ‘लादेन पाकिस्तान में क्यों सुरक्षित महसूस करता था?’
    जयशंकर ने यूरोपीय मीडिया पोर्टल Euractiv से बातचीत के दौरान कहा:
    ओसामा बिन लादेन वर्षों तक पाकिस्तान के एक सैन्य शहर में छिपा रहा। ये सिर्फ भारत और पाकिस्तान का मामला नहीं है, ये आतंकवाद का मुद्दा है, जो कभी भी यूरोप को भी चपेट में ले सकता है।”

    उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत की सैन्य कार्रवाई “आत्मरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई” है, न कि युद्ध उकसाने की कोई कोशिश।

    भारत और यूरोपीय यूनियन के बदलते रिश्ते
    जयशंकर ने संकेत दिया कि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement) को लेकर बातचीत तेज़ हो रही है। भारत, रूस और चीन के साथ बढ़ती साझेदारी के बीच अब यूरोप के साथ रणनीतिक विविधता चाहता है।

    रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का स्पष्ट रुख
    जब पूछा गया कि भारत ने रूस पर प्रतिबंध लगाने से परहेज़ क्यों किया, तो जयशंकर ने साफ कहा: “हम नहीं मानते कि युद्ध से शांति लाई जा सकती है। युद्ध समाधान नहीं, बल्कि मानवता की विफलता है।”

    उन्होंने कहा कि भारत, यूक्रेन और रूस दोनों के साथ संबंध रखता है और इस संघर्ष में वह निर्देशक या निर्णायक भूमिका नहीं निभाना चाहता।

    इतिहास से सबक ले यूरोप – जयशंकर
    जयशंकर ने याद दिलाया कि 1947 में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर हमला किए जाने के समय यूरोपीय देश पाकिस्तान के समर्थन में थे। उन्होंने कहा कि हर देश अपनी विदेश नीति अपने इतिहास, अनुभव और हितों के आधार पर बनाता है, और भारत का यह अनुभव भूलने योग्य नहीं है।

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