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पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए स्ट्रैटजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट ने भारत की राजनीति में हलचल मचा दी है। कांग्रेस पार्टी ने इस समझौते को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर सीधे सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार की “व्यक्तित्व-आधारित कूटनीति” (Personality-Driven Diplomacy) की वजह से भारत रणनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ रहा है।
पाक-सऊदी समझौते की अहम बातें
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इस समझौते पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हस्ताक्षर किए।
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समझौते के अनुसार, अगर किसी एक देश पर हमला होगा तो दूसरा देश उसे अपने ऊपर हमला मानकर प्रतिक्रिया देगा।
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इसे पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच गहरे होते रक्षा और सामरिक सहयोग का संकेत माना जा रहा है।
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इसमें सैन्य प्रशिक्षण, हथियारों के आदान-प्रदान और इंटेलिजेंस शेयरिंग को भी शामिल किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
कांग्रेस का आरोप
कांग्रेस ने कहा है कि यह समझौता भारत की विदेश नीति की गंभीर असफलता को दर्शाता है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने बयान जारी कर कहा:
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मोदी सरकार की विदेश नीति केवल “इवेंट मैनेजमेंट” बनकर रह गई है।
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रणनीतिक संतुलन बनाने में भारत पिछड़ रहा है और पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को मज़बूत करने में विफल हो रहा है।
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पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच यह रक्षा समझौता भारत की सुरक्षा के लिए लंबे समय तक चुनौती बन सकता है।
जयराम रमेश ने यह भी कहा कि मोदी सरकार की व्यक्तिगत छवि पर आधारित कूटनीति भारत को क्षेत्रीय स्तर पर कमजोर कर रही है।
भारत की सुरक्षा पर संभावित असर
विशेषज्ञों के अनुसार इस समझौते के कई दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं:
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सीमा सुरक्षा पर दबाव:
पाकिस्तान पहले से ही भारत के लिए सुरक्षा चुनौती है। अब अगर उसे सऊदी अरब का रक्षा सहयोग मिलता है, तो सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत को अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ सकता है। -
मध्य-पूर्व में भारत का संतुलन बिगड़ना:
भारत और सऊदी अरब के रिश्ते ऊर्जा, निवेश और व्यापार के क्षेत्र में काफी मजबूत हैं। लेकिन पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौते से भारत-सऊदी संबंधों में नई पेचीदगियाँ आ सकती हैं। -
रणनीतिक प्रतिस्पर्धा:
अगर सऊदी अरब पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य मदद बढ़ाता है, तो भारत को अपने रणनीतिक साझेदारों—जैसे अमेरिका, फ्रांस और रूस—के साथ और गहरे रक्षा समझौते करने पड़ सकते हैं। -
आतंकवाद विरोधी सहयोग पर असर:
भारत लगातार सऊदी अरब से आतंकवाद और कट्टरपंथ पर सख्त रुख अपनाने की अपेक्षा करता रहा है। अब यह देखना होगा कि क्या यह नया समझौता भारत के लिए बाधा बनेगा।
सरकार का पक्ष
विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि भारत इस समझौते पर करीबी नज़र रख रहा है और इससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा:
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भारत अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखेगा।
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भारत-सऊदी संबंध ऊर्जा, निवेश और लोगों के आपसी संपर्क पर आधारित हैं और इन पर कोई असर नहीं होगा।
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भारत की सुरक्षा और कूटनीति “मजबूत और बहुआयामी” है।
राजनीतिक मायने
यह मुद्दा संसद और चुनावी राजनीति में बड़ा विषय बन सकता है। कांग्रेस पहले ही मोदी सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा पर घेरने की रणनीति अपना रही है। आने वाले महीनों में यह बहस तेज हो सकती है कि मोदी सरकार ने विदेश नीति में रणनीतिक ग़लतियाँ की हैं या नहीं।
भाजपा का मानना है कि यह समझौता केवल प्रतीकात्मक है और भारत की स्थिति पर इसका कोई गंभीर असर नहीं होगा। वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट बता रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय
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रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि यह समझौता भले ही भारत के लिए सीधा खतरा न हो, लेकिन यह पाकिस्तान को नया आत्मविश्वास ज़रूर देगा।
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पूर्व राजनयिकों का मानना है कि भारत को इस स्थिति में “संतुलनकारी कूटनीति” अपनानी चाहिए और सऊदी अरब के साथ अपने रिश्तों को और मज़बूत करना चाहिए।
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सुरक्षा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में भारत को अपनी रक्षा तैयारियों और सीमावर्ती इलाकों में इंटेलिजेंस क्षमताओं को और मज़बूत करना होगा।
पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौता भारतीय राजनीति में नया विवाद पैदा कर चुका है। कांग्रेस इसे मोदी सरकार की कूटनीतिक असफलता मान रही है, जबकि सरकार इसे भारत की सुरक्षा पर अप्रभावी बता रही है।







