26 नवंबर 1938 को महात्मा गांधी ने हरिजन पत्रिका में एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था—
“फिलिस्तीन अरबों के लिए वैसा ही है, जैसा इंग्लैंड अंग्रेजों के लिए और फ्रांस फ्रेंच लोगों के लिए।”
गांधीजी का यह बयान उस दौर के लिए बेहद अहम था। उन्होंने यह भी जोड़ा कि फिलिस्तीन को अरबों से छीनकर यहूदियों को देना न्यायसंगत नहीं होगा। इस विचार ने भारत की स्वतंत्रता के बाद की विदेश नीति को भी प्रभावित किया।
नेहरू और आज़ाद भारत का शुरुआती रुख
भारत की आज़ादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में विदेश नीति के कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। 1947 में जब संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) में फिलिस्तीन के बंटवारे का प्रस्ताव आया, तो भारत ने इसका विरोध किया।
नेहरू मानते थे कि फिलिस्तीन का विभाजन स्थायी शांति की बजाय लंबे संघर्ष को जन्म देगा। यही कारण था कि भारत उस समय फिलिस्तीन के पक्ष में खड़ा रहा।
शीत युद्ध काल में भारत का संतुलन
1950 और 1960 के दशक में भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की नीति अपनाई। इस दौर में भारत ने हमेशा फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय और स्वतंत्र राज्य की वकालत की।
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1974 में भारत फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में शामिल हुआ।
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1988 में जब फिलिस्तीन ने स्वतंत्रता की घोषणा की, तब भारत ने इसे आधिकारिक रूप से मान्यता दी।
यह भारत की कूटनीतिक सोच का हिस्सा था, जिसमें अरब देशों के साथ गहरे संबंध बनाए रखना शामिल था।
इजराइल से संबंधों का नया अध्याय
हालांकि भारत लंबे समय तक फिलिस्तीन का समर्थक रहा, लेकिन 1992 में इजराइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए गए। इसके पीछे कई कारण थे—
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शीत युद्ध का अंत और सोवियत संघ का विघटन।
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वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदलाव और भारत की आर्थिक उदारीकरण नीति।
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सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में सहयोग की बढ़ती आवश्यकता।
इसके बाद से भारत ने इजराइल के साथ रक्षा, कृषि, तकनीक और व्यापार में सहयोग को लगातार बढ़ाया।
हालिया घटनाक्रम: गाजा युद्ध और भारत की भूमिका
बीते कुछ महीनों में गाजा में संघर्ष और इजराइल की सैन्य कार्रवाई ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींचा। इस साल जून में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गाजा में युद्धविराम (सीजफायर) के प्रस्ताव पर भारत ने मतदान से दूरी बनाई।
भारत के इस रुख को कई विश्लेषकों ने संतुलन साधने की कोशिश बताया। भारत फिलिस्तीन के अधिकारों का समर्थन करता है, लेकिन साथ ही इजराइल के साथ उसके रक्षा और तकनीकी संबंध भी अहम हैं।
बीते 5 दिनों में भारत की विदेश नीति पर उठे सवाल
पिछले 5 दिनों में हुए घटनाक्रमों ने भारत की विदेश नीति को चर्चा में ला दिया है।
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गाजा पट्टी में हिंसा और नागरिकों की मौतों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
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भारत ने मानवीय मदद भेजने का ऐलान किया, लेकिन राजनीतिक रूप से तटस्थ रुख बनाए रखा।
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इससे यह बहस शुरू हो गई कि क्या भारत अब गांधी-नेहरू की विरासत से हटकर अधिक व्यावहारिक कूटनीति अपना रहा है।
विश्लेषण: बदलते समय के साथ बदलती नीति
भारत की विदेश नीति हमेशा वास्तविकताओं पर आधारित रही है।
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अतीत में भारत ने फिलिस्तीन का समर्थन इसलिए किया, क्योंकि औपनिवेशिक शासन और आज़ादी की लड़ाई का साझा अनुभव था।
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आज भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा साझेदारी और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दे ज्यादा अहम हो गए हैं।
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भविष्य में भारत को दोनों पक्षों के साथ संबंधों का संतुलन साधना ही पड़ेगा, क्योंकि यह क्षेत्र उसकी विदेश नीति के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।
विशेषज्ञों की राय
विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का रुख “संतुलित कूटनीति” की ओर इशारा करता है।
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भारत फिलिस्तीन की जनता के अधिकारों का समर्थन करता है।
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साथ ही इजराइल को सुरक्षा साझेदार मानकर सहयोग भी बढ़ा रहा है।
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भारत की कोशिश है कि दोनों देशों के बीच संघर्ष कम हो और वह मध्यस्थ की भूमिका निभा सके।
महात्मा गांधी से लेकर पंडित नेहरू और अब प्रधानमंत्री मोदी तक, भारत की विदेश नीति ने फिलिस्तीन-इजराइल मुद्दे पर कई मोड़ देखे हैं।
भारत अब न तो केवल फिलिस्तीन समर्थक है और न ही पूरी तरह इजराइल की तरफ झुका हुआ। बल्कि आज भारत व्यावहारिक कूटनीति अपनाते हुए दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
यह संतुलन भारत की रणनीतिक मजबूरी भी है और उसकी विदेश नीति की परिपक्वता भी।







