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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने शताब्दी वर्ष के विजयादशमी कार्यक्रम में एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों के बीच चर्चा छेड़ दी है। संघ ने इस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई की मां कमलताई गवई को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया। इस फैसले ने संघ की परंपरागत रणनीति और विचारधारा को लेकर सवाल उठाए हैं।
कमलताई गवई को आमंत्रित करने के मायने
विश्लेषकों का कहना है कि आरएसएस ने कमलताई गवई को मुख्य अतिथि बनाकर न केवल न्यायपालिका के प्रति अपने सम्मान को दिखाया है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी देने की कोशिश की है। संघ के इस कदम को कुछ लोग संघ की उदारता और पारंपरिक विचारधारा से अलग नजरिए के रूप में देख रहे हैं।
संघ की परंपरागत रणनीति
आरएसएस लंबे समय से अपने कार्यक्रमों में उन्हीं शख्सियतों को आमंत्रित करता आया है, जो उसकी विचारधारा के अनुकूल होती हैं। संघ के कार्यक्रमों में आमंत्रित व्यक्तित्व अक्सर संघ के विचारों और नीतियों के समर्थक होते हैं। ऐसे में कमलताई गवई का आमंत्रण एक नई सोच और संभावित सिग्नल के रूप में देखा जा रहा है।
पूर्व में संघ ने किन शख्सियतों को आमंत्रित किया
संघ के शताब्दी वर्ष और अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में पहले कई प्रमुख शख्सियतों को आमंत्रित किया गया। इनमें राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र की ऐसी हस्तियां शामिल थीं, जिनका संघ की विचारधारा से सीधा तालमेल होता था। ऐसे निर्णय अक्सर संघ की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं।
विशेषज्ञों का विश्लेषण
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक मानते हैं कि कमलताई गवई को आमंत्रित करना संघ के दृष्टिकोण में एक नया मोड़ हो सकता है। यह संकेत हो सकता है कि संघ अब अपनी विचारधारा को व्यापक स्तर पर दिखाना चाहता है या न्यायपालिका और समाज के बीच एक सकारात्मक संदेश देना चाहता है।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव
इस कदम का प्रभाव सिर्फ संघ तक सीमित नहीं है। सामाजिक दृष्टि से इसे महिला सशक्तिकरण और पारिवारिक सम्मान का प्रतीक भी माना जा रहा है। राजनीतिक रूप से, यह संघ के दृष्टिकोण और न्यायपालिका के प्रति सम्मान को दर्शाता है, जो आने वाले समय में विभिन्न दलों और मीडिया में चर्चा का विषय बनेगा।
आरएसएस का यह निर्णय कि CJI बीआर गवई की मां कमलताई गवई को मुख्य अतिथि बनाया जाए, न केवल संघ की परंपराओं में बदलाव का संकेत देता है, बल्कि यह राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी है। संघ ने इस कदम से यह दिखाने की कोशिश की है कि वह अपनी विचारधारा के अलावा समाज और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाने की ओर भी ध्यान दे रहा है।








