देशभक्ति और प्रेरणा की एक अमर धरोहर ‘वंदे मातरम’ इस साल अपने 150 वर्ष पूरे कर रहा है। यह राष्ट्रगीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन चुका है और हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की भावना को जगाता है। 7 नवंबर 1876 को बंगाल के कांतल पाड़ा गांव में कवि और उपन्यासकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम की रचना की थी।
गीत को पहली बार 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया, यानी भारत को स्वतंत्रता मिलने से लगभग 51 साल पहले। इसने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ विरोध और आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह गीत न केवल एक उत्साहवर्धक स्वर था, बल्कि उनके संघर्ष में शक्ति और उत्साह जोड़ने वाला प्रेरक तत्व भी साबित हुआ।
वंदे मातरम ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक जागरूकता और एकता की लहर पैदा की। यह गीत सभी वर्गों, भाषाओं और प्रांतों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का काम करता रहा। जब अंग्रेज़ों ने देश में शासन किया, तब वंदे मातरम उनकी नीतियों के विरोध का प्रतीक बन गया। स्वतंत्रता सेनानियों ने इस गीत को अपने जुनून और हिम्मत का प्रतीक माना।
रबींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम को स्वरबद्ध किया और इसे और भी व्यापक रूप दिया। उनका संगीत इस गीत की भावनात्मक गहराई को जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। आज भी वंदे मातरम का स्वर प्रत्येक भारतीय को गर्व और प्रेरणा से भर देता है।
2025 में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर सरकार ने देशभर में 150 स्थानों पर विशेष आयोजन करने का निर्णय लिया है। इन आयोजनों में देशवासियों को वंदे मातरम की महिमा, उसकी ऐतिहासिक भूमिका और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के बारे में बताया जाएगा। प्रत्येक आयोजन में गीत का सामूहिक गायन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और इतिहास से जुड़ी जानकारियाँ साझा की जाएंगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से यह आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर देशभक्ति की भावना को मजबूत करने का एक बड़ा प्रयास है। यह अवसर न केवल वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मनाने का है, बल्कि भारतीय संस्कृति और आजादी की गाथा को युवाओं तक पहुँचाने का भी अवसर है।
वंदे मातरम के शब्द भारत माता की महिमा, उसकी सुंदरता और उसके संरक्षण के प्रति प्रेम की भावना को उजागर करते हैं। इस गीत का मूल उद्देश्य लोगों में देशभक्ति, एकता और स्वतंत्रता के लिए समर्पण की भावना पैदा करना है।
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वंदे मातरम, वंदे मातरम!
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शुभ्रज्योतिर्लिंगम्, शुभ्रज्योतिर्लिंगम्!
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कोटि-कोटि-कण्ठकलुषित, कोटि-कोटि-कण्ठकलुषित!
यह गीत आज भी स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी कार्यक्रमों और राष्ट्रीय आयोजनों में नियमित रूप से गाया जाता है। युवा पीढ़ी इसे गाकर स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और देशभक्ति की प्रेरणा को महसूस करती है।
150 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रमों में सभी आयु वर्ग के लोग शामिल होंगे। स्कूल, कॉलेज और नागरिक समाज की भागीदारी से यह आयोजन और भी व्यापक होगा। लोगों में यह संदेश जाएगा कि स्वतंत्रता केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि आज भी हमारे जीवन और जिम्मेदारियों का हिस्सा है।
इस अवसर पर वंदे मातरम की गूंज हर कोने में सुनाई देगी और हर भारतीय का दिल देशभक्ति और गर्व से भर जाएगा। यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमारी एकता, हमारी संस्कृति और हमारी आजादी कितनी महत्वपूर्ण है।








