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  • नए डेटा प्रोटेक्शन नियम लागू: माता-पिता की सहमति भी नहीं जरूरी! DPDP एक्ट आपके डिजिटल जीवन को कैसे बदलेगा

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    भारत में डिजिटल निजता (Privacy) को लेकर वर्षों से चली आ रही बहस के बीच आखिरकार केंद्र सरकार ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट से जुड़े नियम लागू कर दिए हैं। संसद में यह कानून पारित हुए दो वर्ष बीत चुके हैं और अब 14 नवंबर 2024 से इसके नियमों का वास्तविक प्रभाव शुरू हो चुका है। इन नियमों का असर सीधा देश के आम नागरिकों, डिजिटल उपयोगकर्ताओं और विशेष रूप से बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर पड़ने वाला है।

    नए नियमों ने सबसे अधिक चर्चा इसलिए बटोरी है क्योंकि इनमें कुछ ऐसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं, जिनके तहत अब स्कूल, अस्पताल, क्लिनिक और डे-केयर सेंटर बच्चों के डेटा को मॉनिटर या ट्रैक कर सकेंगे, और इसके लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य नहीं होगी। यह प्रावधान सख्त शर्तों के साथ लागू होगा, लेकिन इसे लेकर अभिभावकों और प्राइवेसी विशेषज्ञों के बीच चिंता भी तेजी से बढ़ रही है।

    क्या है नया प्रावधान?

    ET की रिपोर्ट के अनुसार, “डेटा फिडूशियरी”—यानी वह संस्था जो किसी व्यक्ति के डेटा का जिम्मा उठाती है—को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत डेटा कम से कम एक वर्ष तक अपने पास रखने की अनुमति दी गई है। इससे सरकार, जब चाहे, निर्धारित कानूनों के तहत उस जानकारी को प्राप्त, उपयोग और साझा कर सकती है।

    इसके साथ ही, DPDP नियमों का एक विशेष प्रावधान यह भी कहता है कि अस्पताल, क्लिनिक, डे-केयर और स्कूल, आवश्यकता पड़ने पर बच्चों की गतिविधियों पर निगरानी रख सकते हैं, और इसके लिए अब माता-पिता से अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है। इसका अर्थ यह है कि किसी स्कूल या संस्थान द्वारा छात्र की लोकेशन, उपस्थिति या सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों पर निगरानी संभव हो जाएगी।

    क्यों जरूरी समझे गए ये बदलाव?

    सरकार का तर्क है कि बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई बार ऐसी स्थितियाँ बनती हैं, जहां तत्काल निगरानी की जरूरत होती है। जैसे—स्कूल बस की सुरक्षा, कैंपस मॉनिटरिंग, मेडिकल इमरजेंसी, दुर्व्यवहार की रोकथाम आदि। ऐसे मामलों में माता-पिता से हर बार सहमति लेना व्यवहारिक तौर पर मुश्किल हो सकता है। इसलिए DPDP में ऐसे अपवाद जोड़े गए हैं जो “बच्चों के हित में” निगरानी की अनुमति देते हैं।

    हालांकि यह भी सच है कि DPDP के तहत डेटा फिडूशियरी को सख्त डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करना होगा—इसमें डेटा का सुरक्षित भंडारण, नियंत्रित उपयोग और उसके लीक होने की स्थिति में तत्काल सूचना शामिल है।

    माता-पिता क्यों चिंतित?

    डेटा निगरानी की इस नई व्यवस्था ने बच्चों की निजता और उनके डिजिटल भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि—

    • बिना सहमति निगरानी का अधिकार बहुत व्यापक है

    • स्कूल या संस्थान डेटा का गलत उपयोग कर सकते हैं

    • निरंतर ट्रैकिंग बच्चों की स्वतंत्रता और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है

    • डेटा सुरक्षा में किसी भी तरह की चूक गंभीर खतरा बन सकती है

    माता-पिता का सबसे बड़ा सवाल यही है: अगर सहमति की आवश्यकता नहीं है, तो फिर डेटा की सुरक्षा और उसकी पारदर्शिता सुनिश्चित कैसे होगी?

    DPDP एक्ट आपकी डिजिटल जिंदगी कैसे बदलेगा?

    नए नियम लागू होने के साथ ही कई बड़े बदलाव अब आम नागरिकों के जीवन में देखने को मिलेंगे—

    1. डिजिटल प्लेटफॉर्म को आपके डेटा के उपयोग की स्पष्ट जानकारी देनी होगी।

    2. आपको किसी भी समय अपनी सहमति वापस लेने का अधिकार रहेगा।

    3. यदि आपका डेटा गलत हाथों में जाता है, तो आपको इसकी तत्काल जानकारी दी जानी अनिवार्य होगी।

    4. सरकारी एजेंसियों को कुछ मामलों में डेटा साझा करने की अनुमति मिलेगी।

    5. बच्चों के डेटा पर विशेष सुरक्षा लागू होगी, भले ही संस्थानों को कुछ मामलों में छूट दी गई हो।

    DPDP एक्ट भारत को डेटा सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़े और महत्वपूर्ण बदलाव की ओर ले जा रहा है। यह कानून नागरिकों को डिजिटल अधिकार देता है, लेकिन साथ ही ऐसे अपवाद भी बना देता है, जिन पर लगातार बहस जारी है।

    माता-पिता और डिजिटल विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चों की प्राइवेसी की बात आती है, तो किसी भी तरह की निगरानी बेहद जिम्मेदारी से की जानी चाहिए। आने वाले समय में यह देखना ज़रूरी होगा कि संस्थान इन नियमों का सख्ती से पालन करते हैं या नहीं, और क्या नागरिकों की डिजिटल प्राइवेसी वास्तव में सुरक्षित रहती है।

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