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बिहार विधानसभा चुनाव में मिली हार ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के भीतर गहरे असंतोष और मतभेद की स्थिति पैदा कर दी है। चुनाव परिणामों में पार्टी को उम्मीद के मुताबिक सफलता न मिलने के बाद संगठन के भीतर खींचतान तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, कई विधायक और वरिष्ठ नेता चुनावी रणनीति, नेतृत्व के फैसलों और गठबंधन प्रबंधन को लेकर खुलकर सवाल उठाने लगे हैं। इस राजनीतिक उथल-पुथल ने न केवल पार्टी की एकजुटता को चुनौती दी है, बल्कि आने वाले महीनों में आरजेडी के राजनीतिक मार्ग पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
चुनाव के दौरान आरजेडी ने खुद को मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में प्रस्तुत किया था, लेकिन अंतिम परिणाम पार्टी के जनाधार के कमजोर होने का संकेत दे रहे हैं। हार का अंतर और कई परंपरागत सीटों का हाथ से निकल जाना उन कार्यकर्ताओं को भी असहज कर रहा है, जो लंबे समय से आरजेडी को बिहार की राजनीति की सबसे मजबूत विपक्षी आवाज़ मानते थे। बताया जा रहा है कि हार के बाद हुई आंतरिक बैठकों में कई नेताओं ने खुले रूप से यह मुद्दा उठाया कि जमीनी स्तर पर पार्टी की पकड़ कमज़ोर होती जा रही है और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए।
इन बैठकों में यह भी सामने आया कि कई विधायकों ने अपने क्षेत्रों में पार्टी की छवि खराब होने, स्थानीय नेताओं की अनदेखी और टिकट बंटवारे की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को हार का मुख्य कारण बताया है। सूत्रों की मानें तो पार्टी के अंदर दो-तीन धड़े बनते दिख रहे हैं। इनमें से एक धड़ा नेतृत्व में बदलाव की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा धड़ा इस समय किसी तरह की बड़े बदलाव के खिलाफ है और मानता है कि पार्टी को एकजुट रहकर चुनावी हार की समीक्षा करनी चाहिए।
इसके अलावा यह भी चर्चा है कि कुछ विधायक किसी नए राजनीतिक समीकरण या गठबंधन का हिस्सा बनने की संभावना तलाश रहे हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर पार्टी नेतृत्व ने इन कयासों को निराधार बताया है और दावा किया है कि आरजेडी एकजुट है तथा किसी प्रकार का विभाजन नहीं होने वाला। लेकिन राजनीतिक गलियारों में उठ रही आवाज़ों और विधायकों की चुप्पी कई तरह के संकेत दे रही है।
आरजेडी नेतृत्व ने एक तरफ जहां कार्यकर्ताओं और जनता का विश्वास बनाए रखने पर जोर दिया है, वहीं दूसरी ओर समीक्षा बैठकों के जरिए हार के कारणों को समझने की कोशिश जारी है। पार्टी ने कहा है कि परिणाम चाहे कुछ भी हों, संघर्ष और जनसेवा का रास्ता जारी रहेगा। हालांकि, सवाल यह है कि क्या केवल बयानबाज़ी से असंतुष्ट विधायकों को मनाया जा सकेगा, या पार्टी को संगठनात्मक संरचना में कुछ अहम बदलाव करने पड़ेंगे।
बिहार की राजनीति में हमेशा से गठबंधन, टूट और नए समीकरणों का दौर चलता रहा है। ऐसे में आरजेडी के भीतर पैदा हुआ यह संकट आने वाले समय में बड़े राजनीतिक उलटफेर की नींव रख सकता है। फिलहाल, सारे राजनीतिक दल आरजेडी की इस आंतरिक हलचल पर नजरें जमाए हुए हैं, क्योंकि इसका असर न केवल पार्टी की दिशा और नेतृत्व पर पड़ेगा बल्कि बिहार की समूची राजनीतिक तस्वीर को भी बदल सकता है।







