इस खबर को सुनने के लिये प्ले बटन को दबाएं।

भारत ने स्वदेशी बायो‑बिटुमेन तकनीक को अपनाकर राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में एक नए “साफ़‑हरित हाईवे” युग की शुरुआत की है। यह पहल फॉसल‑ईंधन आधारित पारंपरिक बिटुमेन पर निर्भरता कम करेगी तथा पर्यावरण के अनुकूल राजमार्गों को विकसित करने में मदद करेगी।
क्या है बायो‑बिटुमेन?
बायो‑बिटुमेन एक पर्यावरण‑अनुकूल वैकल्पिक बाइंडर है जिसे कृषि अपशिष्ट, बायोमास और पराली से तैयार किया जाता है। इस तकनीक में कृषि अवशेष को पायरोलिसिस प्रक्रिया से बायो‑ऑयल में बदला जाता है और फिर इसे पारंपरिक बिटुमेन के साथ मिश्रित करके सड़क निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है।
स्वदेशी तकनीक और Clean‑Green Highways का लक्ष्य
नई दिल्ली में आयोजित बायो‑बिटुमेन via पायरोलिसिस: फार्म अवशेष से रोड्स तक नामक तकनीकी हस्तांतरण समारोह में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि यह तकनीक भारत को “क्लीन, ग्रीन हाईवे” के युग में प्रवेश करवा रही है। उन्होंने बताया कि यह समाधान न केवल सड़क निर्माण को अधिक लागत‑प्रभावी और दीर्घकालिक बनाता है बल्कि पर्यावरण प्रदूषण को भी महत्वपूर्ण रूप से कम करेगा।
आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ
वर्तमान में भारत अपनी बिटुमेन आवश्यकताओं का लगभग आधा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है, जिसके कारण हर साल ₹25,000–₹30,000 करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। बायो‑बिटुमेन के उपयोग से यह निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी और आयात लागत में भारी कमी आएगी।
इसके अलावा, कृषि अवशेष को सड़क निर्माण सामग्री में बदलने से पराली जलाने जैसी हानिकारक प्रथाओं पर भी रोक लगने की उम्मीद है, जिससे वायु प्रदूषण में कमी आएगी और किसानों के लिए एक वैकल्पिक आय स्रोत भी विकसित होगा।
क्षेत्रीय परीक्षण और उपयोग
पहले से ही मेघालय के एनएच‑40 जोराबाट‑शिलॉन्ग एक्सप्रेसवे पर 100 मीटर के ट्रायल खंड को सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है, जहां बायो‑बिटुमेन मिश्रण का उपयोग किया गया है। इसके अलावा यह तकनीक विविध भौगोलिक क्षेत्रों और मौसम स्थितियों में परीक्षण के तहत है, ताकि बड़े पैमाने पर अपनाने से पूर्व उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।
देश में एक वैश्विक उपलब्धि
भारत अब विश्व का पहला देश बन गया है जिसने बायो‑बिटुमेन के वाणिज्यिक उत्पादन और सड़क निर्माण उपयोग के लिए इस तकनीक को अपनाया है — यह एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि भी मानी जा रही है।
इस पहल से न केवल भारत के सड़क नेटवर्क की मजबूती और पर्यावरण‑सुरक्षा में वृद्धि होगी, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में उद्योग, अनुसंधान और ग्रामीण आजीविका को भी प्रोत्साहन देगी।








