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महाराष्ट्र में हर वर्ष 27 फरवरी को मराठी भाषा गौरव दिन बड़े उत्साह और सम्मान के साथ मनाया जाता है। यह दिवस महान कवि, नाटककार और साहित्यकार कुसुमाग्रज की जयंती के अवसर पर समर्पित है। कुसुमाग्रज का वास्तविक नाम विष्णु वामन शिरवाडकर था और उन्होंने मराठी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में अमूल्य योगदान दिया। उनके साहित्य और समाज सेवा के कार्यों के सम्मान में महाराष्ट्र सरकार ने 27 फरवरी को मराठी भाषा गौरव दिन के रूप में घोषित किया।
मराठी भाषा गौरव दिन केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक है। इस अवसर पर राज्यभर में स्कूलों, कॉलेजों, साहित्यिक संस्थाओं और सांस्कृतिक मंचों पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कविता पाठ, निबंध प्रतियोगिता, व्याख्यानमाला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से मराठी भाषा की समृद्ध परंपरा को याद किया जाता है।
कुसुमाग्रज का जन्म 27 फरवरी 1912 को हुआ था। उन्होंने कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास जैसी विधाओं में उत्कृष्ट लेखन किया। उनकी रचनाओं में मानवता, सामाजिक न्याय और स्वतंत्रता की प्रबल भावना दिखाई देती है। उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह ‘विश्वविख्यात’, ‘विशाखा’ तथा कई नाटकों ने मराठी साहित्य को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके साहित्य में समाज के वंचित वर्गों के प्रति संवेदना और स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
मराठी भाषा की ऐतिहासिक यात्रा अत्यंत समृद्ध रही है। संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव और एकनाथ जैसे संत कवियों से लेकर आधुनिक युग के साहित्यकारों तक, इस भाषा ने विविध कालखंडों में समाज को दिशा दी है। मराठी भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक चेतना का आधार है। ऐसे में मराठी भाषा गौरव दिन लोगों को अपनी भाषा की जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा देता है।
27 फरवरी के दिन राज्य के विभिन्न जिलों में विशेष समारोह आयोजित किए जाते हैं। सरकारी कार्यालयों में मराठी भाषा के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है। शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थियों को मराठी में संवाद करने और लेखन करने के लिए प्रेरित किया जाता है। कई स्थानों पर साहित्यकारों और कवियों को सम्मानित भी किया जाता है, जिन्होंने मराठी भाषा के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
आज के वैश्वीकरण और डिजिटल युग में अंग्रेज़ी सहित अन्य भाषाओं का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे समय में मराठी भाषा गौरव दिन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी मातृभाषा को नहीं भूलना चाहिए। भाषा हमारी पहचान है, हमारी संस्कृति है और हमारी विरासत है। यदि हम अपनी भाषा को महत्व देंगे, तो वह आने वाली पीढ़ियों तक सशक्त रूप से पहुंचेगी।
कुसुमाग्रज को उनके साहित्यिक योगदान के लिए देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों से भी नवाजा गया। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। उनका जीवन संघर्ष, संवेदनशीलता और साहित्यिक समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज में समानता और न्याय का संदेश दिया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
मराठी भाषा गौरव दिन का उद्देश्य केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए दिशा तय करना भी है। राज्य सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाएं मराठी भाषा के डिजिटल प्रसार, अनुवाद कार्य और शोध को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत हैं। पुस्तकालयों का आधुनिकीकरण, साहित्यिक महोत्सवों का आयोजन और युवा लेखकों को मंच प्रदान करना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
नाशिक, पुणे, मुंबई और औरंगाबाद जैसे शहरों में इस अवसर पर विशेष साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। विद्यालयों में विद्यार्थी पारंपरिक वेशभूषा में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं और कुसुमाग्रज की कविताओं का वाचन कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह दिन मराठी समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है।
समाज के विभिन्न वर्गों का मानना है कि यदि हम अपने बच्चों को बचपन से ही मातृभाषा के संस्कार देंगे, तो वे अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहेंगे। मराठी भाषा गौरव दिन इसी भावना को सुदृढ़ करता है। यह दिवस हमें गर्व से कहने की प्रेरणा देता है कि हमारी भाषा हमारी ताकत है।
अंततः, 27 फरवरी का यह विशेष दिन महान कवि कुसुमाग्रज की स्मृतियों को नमन करने का अवसर है। उनका साहित्य आज भी प्रेरणा देता है और मराठी भाषा को समृद्ध बनाता है। मराठी भाषा गौरव दिन हमें यह संकल्प दिलाता है कि हम अपनी मातृभाषा के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कुसुमाग्रज और मराठी भाषा की गौरवशाली परंपरा के प्रति।








