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  • नाशिक में विश्व मराठी सम्मेलन: मराठी की बोलियों पर मधु मंगेश कर्णिक का सार्थक चिंतन

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    महाराष्ट्र की सांस्कृतिक नगरी नाशिक एक बार फिर साहित्य और भाषा के रंग में सराबोर दिखाई दी, जब यहां भव्य रूप से विश्व मराठी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस अवसर पर देश और विदेश से आए साहित्यकारों, भाषाविदों, शोधकर्ताओं और मराठी प्रेमियों ने भाषा के विविध आयामों पर चर्चा की। सम्मेलन का मुख्य आकर्षण वरिष्ठ साहित्यकार मधु मंगेश कर्णिक का वक्तव्य रहा, जिसमें उन्होंने मराठी की विभिन्न बोलियों के संरक्षण और उनके महत्व पर विस्तृत विचार रखे।

    अपने संबोधन में कर्णिक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी भाषा की वास्तविक शक्ति उसकी बोलियों में निहित होती है। उन्होंने बताया कि मराठी केवल एक मानक भाषा नहीं, बल्कि अनेक बोलियों का विशाल परिवार है, जिनमें कोकणी, मालवणी, वरहाडी, अहिराणी और दक्षिणी मराठी जैसी कई क्षेत्रीय शैलियाँ शामिल हैं। इन बोलियों में लोकजीवन की महक, लोकपरंपराओं की गूंज और सामाजिक इतिहास के अनगिनत सूत्र छिपे हुए हैं।

    कर्णिक ने चिंता व्यक्त की कि आधुनिकता और वैश्वीकरण के प्रभाव में स्थानीय बोलियों का उपयोग धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में मानक मराठी और अंग्रेज़ी का चलन बढ़ने से पारंपरिक बोलियाँ उपेक्षित हो रही हैं। यदि समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में भाषा का यह अमूल्य खजाना लुप्त हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में क्षेत्रीय बोलियों को भी स्थान दिया जाए, ताकि विद्यार्थी अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

    सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों ने भी इस विषय पर अपने विचार साझा किए। कई वक्ताओं ने बताया कि मराठी की बोलियों में लोककथा, लोकगीत, कहावतें और पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध धरोहर मौजूद है। साहित्यकारों का मत था कि डिजिटल युग में इन बोलियों का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए। ऑडियो, वीडियो और लेखन के माध्यम से इन्हें संरक्षित किया जा सकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ इनसे परिचित हो सकें।

    कार्यक्रम के दौरान नाशिक की सांस्कृतिक पहचान भी झलकती रही। स्थानीय कलाकारों द्वारा लोकनृत्य और लोकसंगीत की मनमोहक प्रस्तुतियां दी गईं, जिनमें विभिन्न मराठी बोलियों की झलक दिखाई दी। इससे सम्मेलन का वातावरण और भी जीवंत हो उठा। साहित्य और संस्कृति के इस संगम ने उपस्थित श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

    मधु मंगेश कर्णिक ने यह भी कहा कि भाषा का विकास केवल व्याकरण और शब्दकोश से नहीं होता, बल्कि लोकजीवन और अनुभवों से होता है। बोलियाँ किसी क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और जीवन शैली को अभिव्यक्त करती हैं। यदि हम इन्हें संरक्षित रखेंगे, तो मराठी भाषा की विविधता और समृद्धि बनी रहेगी। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने घरों में, परिवार में और सामाजिक आयोजनों में अपनी क्षेत्रीय बोली का प्रयोग करें, ताकि भाषा की यह जीवंत परंपरा आगे बढ़ती रहे।

    सम्मेलन में यह विचार भी प्रमुखता से सामने आया कि मराठी साहित्य को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने के लिए अनुवाद कार्य को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। विभिन्न बोलियों में रचित साहित्य को अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवादित कर व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाया जा सकता है। इससे न केवल भाषा का प्रचार होगा, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी सशक्त होगा।

    कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया और यह संकल्प लिया कि भविष्य में भी ऐसे आयोजनों के माध्यम से मराठी भाषा और संस्कृति को सशक्त किया जाएगा। सम्मेलन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की पहचान और आत्मा है।

    विश्व मराठी सम्मेलन का यह आयोजन नाशिक के साहित्यिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। मधु मंगेश कर्णिक के विचारों ने यह स्मरण कराया कि यदि मराठी की बोलियों को संरक्षित और प्रोत्साहित किया जाएगा, तो भाषा की जड़ें और भी मजबूत होंगी। सम्मेलन ने सभी मराठी प्रेमियों को अपनी भाषाई धरोहर के प्रति जागरूक और प्रतिबद्ध रहने की प्रेरणा दी।

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