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  • ईरान युद्ध के बाद ताइवान पर बढ़ा तनाव, चीन ने चारों ओर बढ़ाई सैन्य घेराबंदी; युद्ध की आशंकाएं तेज

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    ईरान युद्ध समाप्त होने के बाद अब दुनिया की नजर पूर्वी एशिया पर टिक गई है, जहां ताइवान को लेकर चीन की आक्रामक सैन्य गतिविधियों ने नए तनाव को जन्म दे दिया है। चीन ने पिछले कुछ वर्षों में ताइवान के चारों ओर अपनी नौसैनिक मौजूदगी लगातार बढ़ाई है और अब लगभग हर समय 5 से 6 युद्धपोत द्वीप को चारों दिशाओं से घेरे रहते हैं।

    सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल नियमित गश्त नहीं, बल्कि चीन की दीर्घकालिक सैन्य रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य ताइवान पर दबाव बढ़ाना और संभावित संघर्ष की स्थिति में बढ़त हासिल करना है।

    धीरे-धीरे बढ़ाई गई सैन्य मौजूदगी

    चीन ने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य तैनाती एक साथ नहीं बढ़ाई, बल्कि चरणबद्ध तरीके से इसे मजबूत किया।

    साल 2020 में चीन ने ताइवान स्ट्रेट में नियमित रूप से एक युद्धपोत की गश्त शुरू की। इसके बाद उत्तर और दक्षिणी समुद्री क्षेत्रों में अतिरिक्त जहाज तैनात किए गए। वर्ष 2022 में ताइवान के पूर्वी तट पर भी चौथा युद्धपोत तैनात किया गया।

    वर्ष 2024 के बाद चीन ने दो और अत्याधुनिक युद्धपोतों की नियमित तैनाती शुरू कर दी। अब सामान्य परिस्थितियों में भी ताइवान के आसपास 5 से 6 चीनी युद्धपोत लगातार मौजूद रहते हैं। किसी विशेष सैन्य अभियान या तनावपूर्ण स्थिति में इनकी संख्या और बढ़ा दी जाती है।

    बड़े युद्धपोतों की तैनाती से बदली रणनीति

    विशेषज्ञों का कहना है कि पहले चीन अपेक्षाकृत छोटे युद्धपोतों का उपयोग करता था, लेकिन अब उनकी जगह आधुनिक गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर तैनात किए जा रहे हैं।

    चीन की नौसेना के पास वर्तमान में 48 अत्याधुनिक गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर हैं, जिनका उपयोग समुद्री सुरक्षा, लंबी दूरी के हमलों और निगरानी अभियानों में किया जाता है।

    खुफिया जानकारी जुटाने पर भी फोकस

    विशेषज्ञों के मुताबिक चीन ताइवान के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में लगातार मौजूद रहकर समुद्र की गहराई, समुद्री मार्गों और रणनीतिक इलाकों का विस्तृत अध्ययन कर रहा है।

    इससे भविष्य में संभावित सैन्य अभियान के दौरान पनडुब्बियों की गतिविधियों पर नजर रखने और समुद्री संचालन को आसान बनाने में मदद मिल सकती है। साथ ही चीन ताइवान की सैन्य तैनाती, संचार व्यवस्था और सुरक्षा नेटवर्क की जानकारी भी जुटा रहा है।

    अमेरिका को दूर रखने की रणनीति

    विश्लेषकों का मानना है कि चीन का एक प्रमुख उद्देश्य अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सैन्य पहुंच को सीमित करना भी है।

    ताइवान के पूर्वी हिस्से में स्थित हुलिएन और ताइतुंग जैसे महत्वपूर्ण सैन्य एयरबेस रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माने जाते हैं। चीन इन इलाकों के आसपास अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाकर अमेरिकी विमानवाहक पोतों, पनडुब्बियों और अन्य सैन्य जहाजों की संभावित तैनाती को कठिन बनाना चाहता है।

    बिना युद्ध के बढ़ाया जा रहा दबाव

    हाल के वर्षों में चीन ने ताइवान स्ट्रेट की मध्य रेखा को पार करते हुए सैन्य उड़ानों की संख्या भी बढ़ाई है। इसके अलावा विदेशी जहाजों के खिलाफ उसकी आक्रामक गतिविधियां भी लगातार बढ़ रही हैं।

    सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन फिलहाल सीधे युद्ध शुरू करने के बजाय लगातार सैन्य दबाव बनाकर ताइवान और उसके सहयोगी देशों को रणनीतिक संदेश देना चाहता है कि भविष्य में किसी भी संभावित कार्रवाई का विरोध करना आसान नहीं होगा।

    क्षेत्रीय सुरक्षा पर बढ़ी चिंता

    ईरान युद्ध के बाद वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां पहले से अधिक संवेदनशील हो गई हैं। ऐसे समय में ताइवान के आसपास चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए नई चुनौती मानी जा रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सैन्य दबाव इसी तरह जारी रहा तो आने वाले समय में ताइवान जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक तनाव का प्रमुख केंद्र बन सकता है।

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