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धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है और अब विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की नई रिपोर्ट ने खतरे की घंटी बजा दी है। संगठन ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट ‘वैश्विक जलवायु स्थिति अपडेट 2025’ में खुलासा किया है कि जनवरी से अगस्त 2025 के बीच धरती की सतह के निकट औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.42 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। यह वृद्धि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव का गंभीर संकेत है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 अब तक का दूसरा या तीसरा सबसे गर्म वर्ष हो सकता है।
डब्ल्यूएमओ का कहना है कि पिछले कुछ सालों में दुनिया के मौसम के पैटर्न में बड़े बदलाव देखे गए हैं। गर्मी की तीव्र लहरें, असामान्य मानसून, सूखे और बाढ़ की घटनाएं सामान्य हो चुकी हैं। संगठन ने गुरुवार को बताया कि वर्ष 2015 से 2025 तक की अवधि, यानी इन 11 वर्षों में, पृथ्वी के पिछले 176 साल के रिकॉर्ड में सबसे गर्म समय मानी जाएगी। खास बात यह है कि पिछले तीन वर्ष — 2023, 2024 और अब 2025 — लगातार सबसे गर्म सालों में शामिल हो रहे हैं। यह सिलसिला बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल भविष्य का खतरा नहीं बल्कि वर्तमान की सच्चाई बन चुका है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा। उस दौरान पहली बार वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक पहुंच गया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह आंकड़ा पेरिस समझौते में तय की गई सीमा के बेहद करीब है। वर्ष 2015 में लगभग 200 देशों ने मिलकर यह संकल्प लिया था कि वे वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे और आदर्श रूप में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखेंगे। लेकिन अब तापमान वृद्धि पहले ही 1.3 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुकी है और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
बर्लिन स्थित क्लाइमेट एनालिटिक्स नामक जलवायु विज्ञान और नीति संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 के दशक की शुरुआत तक पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह रफ्तार जारी रही तो अगले कुछ दशकों में पृथ्वी पर जीवन की परिस्थितियाँ पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएंगी। बढ़ता तापमान समुद्र-स्तर में वृद्धि, ग्लेशियरों के पिघलने, खाद्य सुरक्षा संकट, जैव विविधता के विनाश और चरम मौसमीय घटनाओं में वृद्धि का कारण बन सकता है।
डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2023 और 2024 में वैश्विक तापमान को बढ़ाने वाली अल नीनो स्थितियों की जगह 2025 में तटस्थ या ला नीना स्थितियां विकसित हो सकती हैं। आमतौर पर ला नीना से वैश्विक तापमान में हल्की गिरावट आती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार धरती पर इतनी अधिक गर्मी जमा हो चुकी है कि उसका असर कम पड़ने की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि भले ही ला नीना प्रभाव सक्रिय हो, लेकिन वैश्विक तापमान सामान्य स्तर पर लौटने की उम्मीद नहीं है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति मानव गतिविधियों से जुड़ी है। जीवाश्म ईंधन का बढ़ता उपयोग, जंगलों की कटाई, औद्योगिक प्रदूषण और शहरीकरण ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नई ऊँचाइयों पर पहुंचा दिया है। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें वातावरण में गर्मी फँसाकर धरती के तापमान को लगातार बढ़ा रही हैं।
डब्ल्यूएमओ के महासचिव प्रोफेसर पेटेरी तालस ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, “यह रिपोर्ट पूरी मानवता के लिए चेतावनी है। हम पहले से ही जलवायु संकट के गंभीर प्रभावों को महसूस कर रहे हैं — अब समय है कि देश अपने उत्सर्जन को घटाने और सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाएं।” उन्होंने यह भी कहा कि अब अगर दुनिया ने निर्णायक कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दशक में ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार को रोक पाना लगभग असंभव हो जाएगा।
भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों पर भी इस वैश्विक तापमान वृद्धि का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। हाल के वर्षों में भारत के कई हिस्सों में असामान्य हीटवेव, फसल संकट, सूखा और बाढ़ जैसी चरम घटनाओं ने जनजीवन को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सब जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर का परिणाम है और अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
अंततः, WMO की यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि पृथ्वी के तापमान में 1.42 डिग्री की यह वृद्धि केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य की भयावह हकीकत का संकेत है। यह वह चेतावनी है जिसे अनदेखा करना अब मानवता के लिए संभव नहीं। अगर अभी भी कदम नहीं उठाए गए, तो 21वीं सदी के मध्य तक यह ग्रह एक ऐसे दौर में प्रवेश कर सकता है, जहां गर्मी, सूखा, और जल संकट नई सामान्य स्थिति बन जाएँगे। धरती अब हमारी कार्रवाई की नहीं, बल्कि हमारी ज़िम्मेदारी की प्रतीक्षा कर रही है।








