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भारत और जर्मनी ने रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए हेलीकॉप्टर ऑब्सटैकल अवॉयडेंस सिस्टम यानी OAS के संयुक्त उत्पादन का समझौता किया है। यह डील दुबई एयरशो 2025 में घोषित की गई और इसे पिछले तीन दशकों में भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इस साझेदारी के तहत जर्मनी की रक्षा प्रौद्योगिकी कंपनी हेन्सोल्ड्ट और भारत की प्रमुख एयरोस्पेस एवं रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) मिलकर इस उन्नत सेफ्टी सिस्टम का निर्माण अब पूरी तरह भारत में करेंगे।
हेलीकॉप्टर ऑब्सटैकल अवॉयडेंस सिस्टम (OAS) एक अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीक है जो उड़ान के दौरान हेलीकॉप्टर को पेड़, पहाड़, ऊंची इमारतें या अन्य अवरोधों की पहचान करने और टक्कर से बचने की क्षमता प्रदान करता है। यह तकनीक खासकर उन परिस्थितियों में बेहद महत्वपूर्ण होती है, जहां मौसम खराब हो या दृश्यता कम हो। विशेषज्ञ मानते हैं कि आधुनिक सैन्य और नागरिक हेलीकॉप्टरों में इस तरह की तकनीक होने से दुर्घटनाओं की संभावना काफी कम होती है।
भारत में इस सिस्टम के उत्पादन की शुरुआत 8 दिसंबर से होने जा रही है, जो देश के पहले CDS जनरल बिपिन रावत की पुण्यतिथि का दिन है। यह क्षण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2021 में जनरल रावत जिस हेलीकॉप्टर हादसे का शिकार हुए थे, उसमें तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हेलीकॉप्टर में ऐसा सेफ्टी सिस्टम मौजूद होता तो शायद खराब मौसम में भी वह सुरक्षित लैंड कर सकता था। इसलिए OAS का भारत में उत्पादन न सिर्फ तकनीकी दृष्टि से बल्कि भावनात्मक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दुबई एयरशो 2025 के दौरान दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने इस परियोजना को ‘मेक इन इंडिया’ मिशन को मजबूती देने वाला कदम बताया। इस डील की सबसे दिलचस्प बात यह है कि जर्मनी की कंपनी हेन्सोल्ड्ट ने निर्णय लिया है कि अब से हेलीकॉप्टर OAS सिस्टम का निर्माण केवल भारत में ही किया जाएगा। जर्मनी में इसका उत्पादन पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा, और वैश्विक स्तर पर इसकी सप्लाई भारत के माध्यम से ही होगी। यह कदम भारत को रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है।
एचएएल के प्लांट में बनने वाले इस सिस्टम के डिजाइन, निर्माण और परीक्षण में भारतीय इंजीनियरों की बड़ी भूमिका होगी। इससे न सिर्फ भारत में हाई-एंड रक्षा तकनीक की क्षमताएँ मजबूत होंगी, बल्कि नई नौकरियों और कौशल विकास के अवसर भी पैदा होंगे। यह भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन मिशन को वैश्विक पहचान दिलाने वाला अहम मोड़ साबित हो सकता है।
भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग पहले भी रहा है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर तकनीक हस्तांतरण और संयुक्त निर्माण का यह पहला अवसर है। हेन्सोल्ड्ट का यह फैसला कि वह अपनी विश्वस्तरीय सुरक्षा तकनीक का निर्माण केवल भारत से करवाएगी, वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और विश्वसनीयता को दर्शाता है। यह डील आने वाले समय में दोनों देशों के बीच अन्य रक्षा परियोजनाओं के लिए भी मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में इस तरह की आधुनिक तकनीक का निर्माण देश की सैन्य शक्ति को तो बढ़ाएगा ही, साथ ही नागरिक हेलीकॉप्टर सेवाओं में भी सुरक्षा के नए मानक स्थापित करेगा। देश में हवाई मार्गों, पर्वतीय क्षेत्रों और कठिन भू-भागों में अक्सर हेलीकॉप्टरों का उपयोग बढ़ रहा है, ऐसे में OAS जैसी तकनीक दुर्घटनाओं के जोखिम को काफी कम कर सकती है।
यह डील भारत के लिए रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी—तीनों स्तरों पर एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत को रक्षा विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में यह समझौता बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। जर्मनी की उन्नत तकनीक और भारत की उत्पादन क्षमता मिलकर विश्व बाजार में एक मजबूत और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत कर सकती है। आने वाले वर्षों में इस पहल का प्रभाव न सिर्फ भारत-जर्मनी के रिश्तों पर पड़ेगा, बल्कि भारत को रक्षा निर्यात के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में भी योगदान देगा।







