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छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास केवल किताबों में दर्ज एक अध्याय नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की आत्मा में बसने वाला गौरव है। स्वराज्य का संघर्ष, मावलों की निष्ठा, युद्धभूमि का साहस और हिंदवी स्वराज्य का स्वप्न आज भी हर मराठी मन को प्रेरित करता है। इसी जाज्वल्य इतिहास को लोककला, संगीत और रंगमंच के माध्यम से फिर एक बार जीवंत करने का कार्य किया “Folk शिव आख्यान” ने। छत्रपति संभाजीनगर के संत एकनाथ रंग मंदिर में आयोजित इस भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम ने हजारों शिवप्रेमियों को सीधे शिवकाल की अनुभूति करा दी।
करीब साढ़े तीन घंटे तक चले इस भव्य आयोजन में इतिहास केवल सुनाया नहीं गया, बल्कि मंच पर साकार हुआ। जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे पूरा सभागृह “जय भवानी, जय शिवाजी” के नारों से गूंजने लगा। ढोल-ताशों की गड़गड़ाहट, पोवाड़ों का जोश और कलाकारों की प्रभावशाली प्रस्तुति ने ऐसा माहौल तैयार किया कि हर दर्शक खुद को शिवकाल के बीच महसूस करने लगा।
संत एकनाथ रंग मंदिर में उमड़ा शिवप्रेमियों का सैलाब
“Folk शिव आख्यान” की चर्चा पिछले कई दिनों से संभाजीनगर, जालना, परभणी, नांदेड़ और आसपास के जिलों में हो रही थी। यही वजह रही कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही संत एकनाथ रंग मंदिर के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी। सभागृह पूरी तरह भर चुका था और कई लोग खड़े रहकर इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक आयोजन का आनंद लेते दिखाई दिए।
मंच की सजावट, भगवा वातावरण और पारंपरिक वेशभूषा ने कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही दर्शकों को शिवकालीन युग में पहुंचा दिया था। जैसे ही पहला पोवाड़ा शुरू हुआ, सभागृह तालियों की गूंज से भर उठा।
जब मंच पर जीवित हुआ शिवाजी महाराज का इतिहास
कार्यक्रम में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों को अत्यंत प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया। स्वराज्य स्थापना का संकल्प, अफजल खान वध, सिंहगढ़ का पराक्रम, मावलों की निष्ठा और शिवराज्याभिषेक जैसे प्रसंगों ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए।
हर संवाद में जोश था, हर गीत में स्वाभिमान था और हर प्रस्तुति में महाराष्ट्र की मिट्टी की खुशबू महसूस हो रही थी। कई दर्शकों की आंखें भावुक होकर नम हो गईं, जबकि कई बार पूरा सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
लोककला और इतिहास का अद्भुत संगम
“Folk शिव आख्यान” केवल एक मनोरंजन कार्यक्रम नहीं था, बल्कि महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति को पुनर्जीवित करने वाला सांस्कृतिक अभियान था। आज के आधुनिक दौर में गवळण, भारूड, जागरण-गोंधळ और वासुदेव जैसी पारंपरिक लोककलाएं धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं। लेकिन इस कार्यक्रम ने इन लोककलाओं को नई ऊर्जा देने का कार्य किया।
हलगी, तुणतुणा, मृदंग और पारंपरिक वाद्यों की धुन पर प्रस्तुत लोककलाओं ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। लोकसंगीत और आधुनिक मंचीय प्रस्तुति का ऐसा सुंदर संगम कम ही देखने को मिलता है।
18 गीतों में गूंजा शिवकाल का शौर्य
कार्यक्रम में 18 नए गीतों के माध्यम से शिवकालीन इतिहास को प्रस्तुत किया गया। हर गीत में स्वराज्य के संघर्ष और बलिदान की कहानी छिपी हुई थी। शौर्यगीतों ने पूरे सभागृह में रोमांच पैदा कर दिया।
विशेष आकर्षण रही रायगढ़ की 9 वर्षीय बाल गायिका, जिसने अपनी दमदार आवाज से दर्शकों का दिल जीत लिया। उसकी प्रस्तुति के बाद सभागृह देर तक तालियों से गूंजता रहा।
25 कलाकारों ने बांधा समां
इस भव्य प्रस्तुति में कुल 25 कलाकारों ने भाग लिया। गायन, वादन, अभिनय और निवेदन का शानदार समन्वय इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी ताकत रहा। हर कलाकार ने अपनी भूमिका को पूरी शिद्दत से निभाया।
ओमकार मोरे, आदेश हरकरे, गोपाल गावंडे, आशीष उमाळे, ऋषिकेश कुलकर्णी, संस्कार भवारी, अवधूत बुरले, काव्य कुन्हाडे, राहुल गेंडगे, अभिजित ठाकरे, रोहित तांबे, प्रशांत पाटील, हर्ष येवले, वैष्णवी गिते, गौरी शिंदे, संस्कृती गवई, खुशी शेगावकर, हर्षिता खांडेकर और तनुजा बेलोटे जैसे कलाकारों ने अपने दमदार अभिनय से कार्यक्रम को जीवंत बना दिया।
कार्यक्रम की सफलता के पीछे की टीम
इस सांस्कृतिक आयोजन के पीछे निर्माता, लेखक और संगीतकार योगेश पाटील की महत्वपूर्ण भूमिका रही। निर्माता सुधिरकुमार पठाडे ने इस उपक्रम को मजबूत समर्थन दिया, जबकि निर्देशक मिलिंद बचाल ने कार्यक्रम को भव्य रूप दिया।
लेखक आकाश खंडागळे, निवेदक धीरेंद्र ठाकूर और गोविंद मारशिवणीकर ने भी कार्यक्रम को प्रभावशाली बनाने में अहम योगदान दिया।

लोककला को मिला समाज का समर्थन
इस सांस्कृतिक आयोजन को कई मान्यवरों ने आर्थिक और सामाजिक सहयोग दिया। डॉ. अमित परदेशी, दिलीप शिरुडकर, नीलेश चोपडे, गोविंद पाटील, सौ. पाटील और प्रा. विवेक दीक्षित ने प्रायोजक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके अलावा नंदकिशोर वल्ले-पाटील, सुनील चंद्रहास, योगेश वानखेडे-पाटील, गजानन पठाडे और शिक्षा अधिकारी अश्विनी लाटकर ने कलाकारों को प्रोत्साहित करते हुए उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना की।
“इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही उद्देश्य”
Sure Me Multipurpose Pvt Ltd और Reseal.in के CEO एवं Founder सुधिरकुमार पठाडे ने कहा कि “Folk शिव आख्यान” का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की लोककला, इतिहास और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। शिवाजी महाराज का इतिहास लोगों के मन में जीवित रहे, इसी उद्देश्य से यह सांस्कृतिक अभियान शुरू किया गया है।
अंत में कलाकारों को मिली खड़े होकर मानवंदना
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद पूरा सभागृह खड़े होकर कलाकारों का सम्मान करता दिखाई दिया। हर प्रस्तुति के बाद “वन्स मोर” की मांग हो रही थी। कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी लोगों की चर्चा का केंद्र केवल “फोल्क शिव आख्यान” ही था।
इस कार्यक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि महाराष्ट्र की लोककला, शिवकालीन इतिहास और मराठी संस्कृति आज भी लोगों के दिलों में उसी गर्व और सम्मान के साथ जीवित है। “Folk शिव आख्यान” जैसे उपक्रम केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने वाले जीवंत आंदोलन हैं।








