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  • अंग्रेजी प्रोफेसर साजी वर्गीस का ‘देसी जुगाड़’ यूरोप-अमेरिका में हिट, करोड़पति बना दिया उद्यम

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    बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रोफेसर साजी वर्गीस ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में बल्कि उद्यमिता में भी अपनी छाप छोड़ी है। 2020 में उन्होंने ‘सनबर्ड स्ट्रॉज’ नामक स्टार्टअप शुरू किया, जिसने गिरे हुए नारियल के पत्तों को इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ और पेन में बदलकर एक नया व्यवसाय मॉडल पेश किया। इस उद्यम ने देश ही नहीं बल्कि यूरोप और अमेरिका में भी लोकप्रियता हासिल की है।

    साजी वर्गीस का यह ‘देसी जुगाड़’ शहरी युवाओं और पर्यावरण प्रेमियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो गया। उनके उत्पाद पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल हैं और प्लास्टिक की जगह पर्यावरण के अनुकूल विकल्प पेश करते हैं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक वैश्विक बाजार में इनके स्ट्रॉ और पेन की मांग दिन-ब-दिन बढ़ रही है।

    उनके स्टार्टअप का मुख्य उद्देश्य केवल व्यवसाय करना नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक जागरूकता फैलाना भी है। उन्होंने बताया कि गिरे हुए नारियल के पत्तों को इकट्ठा कर उत्पाद बनाने की प्रक्रिया स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार का अवसर भी देती है।

    सनबर्ड स्ट्रॉज की सफलता का मुख्य कारण है इसकी सादगी और नवाचार। प्रोफेसर साजी ने छोटे से संसाधन और देसी जुगाड़ के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार किए। उनकी टीम ने गिरे हुए नारियल के पत्तों को संसाधित कर स्ट्रॉ और पेन बनाने की विशेष तकनीक विकसित की, जो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कर चुकी है।

    यह स्टार्टअप न केवल पर्यावरण के लिए उपयोगी है, बल्कि निवेशकों के लिए भी आकर्षक साबित हुआ है। 2023 तक सनबर्ड स्ट्रॉज ने यूरोप और अमेरिका में अपनी बिक्री के जरिए करोड़ों का कारोबार कर लिया है। निवेशकों का मानना है कि यह व्यवसाय भविष्य में और तेजी से बढ़ सकता है, क्योंकि इको-फ्रेंडली उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है।

    साजी वर्गीस का यह अनुभव दिखाता है कि किस तरह एक शैक्षिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति भी देसी जुगाड़ और नवाचार के जरिए वैश्विक स्तर पर सफलता हासिल कर सकता है। उनके प्रयास ने यह साबित किया कि छोटे संसाधनों और क्रिएटिव सोच से बड़े आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पैदा किए जा सकते हैं।

    उनकी प्रेरक कहानी ने स्टार्टअप जगत और युवाओं के बीच उत्साह भर दिया है। बहुत से युवा उद्यमी अब उनकी रणनीतियों और नवाचार से सीख लेकर पर्यावरणीय और सामाजिक उद्यमों की ओर बढ़ रहे हैं। इससे यह साबित होता है कि शिक्षा और उद्यमिता का संगम भी समाज और अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।

    संक्षेप में, क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी प्रोफेसर साजी वर्गीस ने ‘सनबर्ड स्ट्रॉज’ के माध्यम से यह दिखा दिया कि छोटे से आइडिया और देसी जुगाड़ के साथ बड़े आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाए जा सकते हैं। उनके इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ और पेन ने न केवल पर्यावरण को बचाया है बल्कि देश-विदेश में करोड़ों रुपये का व्यवसाय भी खड़ा किया है।

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