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दिल्ली की निचली अदालतों में न्याय पाने के लिए लोगों को अब लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार, राजधानी में 15 लाख से अधिक केस अभी भी फैसले का इंतजार कर रहे हैं। यह स्थिति न केवल न्यायिक प्रणाली की कार्यक्षमता पर सवाल उठाती है, बल्कि आम जनता के लिए भी चिंता का विषय बन चुकी है।
पेंडिंग मामलों में नागरिकों से जुड़े छोटे से लेकर बड़े मुद्दे शामिल हैं, जैसे कि संपत्ति विवाद, घरेलू झगड़े, मजदूरी के विवाद और घरेलू हिंसा से जुड़े केस। इन सभी मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं। कोर्ट के अधिकारियों का कहना है कि यह देरी सिर्फ मामलों की संख्या बढ़ने के कारण नहीं, बल्कि जजों की कम संख्या और न्यायिक संसाधनों की कमी के कारण भी हो रही है।
जजों की कमी और पेंडिंग मामलों का असर
दिल्ली की निचली अदालतों में वर्तमान में लगभग 500 से 600 जज कार्यरत हैं। जबकि जरूरत इससे कई गुना अधिक है। जजों की कम संख्या के कारण अदालतें रोजाना सीमित मामलों की सुनवाई ही कर पाती हैं। इससे हर दिन नए दर्ज होने वाले मामलों के साथ पुराने मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी के अनुसार, “अगर जजों की संख्या बढ़ाई जाती और अदालतों में तकनीकी संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जाता, तो पेंडिंग मामलों की संख्या कम की जा सकती थी। लेकिन संसाधनों की कमी और बढ़ते मामलों के दबाव के कारण जनता को न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं।”
क्यों बढ़ रहे हैं पेंडिंग केस?
न्याय व्यवस्था में देरी के कई कारण हैं। पहला कारण है मामलों की लगातार बढ़ती संख्या। दिल्ली में रोजाना दर्ज होने वाले नए मामलों की संख्या हजारों में है। दूसरा कारण है जजों और कर्मचारियों की कमी। तीसरा कारण तकनीकी संसाधनों का सीमित उपयोग। अधिकतर अदालतों में डिजिटल प्रणाली और ई-फाइलिंग अभी पूरी तरह से लागू नहीं है, जिससे मामलों की सुनवाई और ट्रैकिंग धीमी हो जाती है।
इसके अलावा, कई मामलों में वकील और पक्षकारों की देरी भी न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है। सुनवाई के लिए बार-बार तारीख बदलने और अपील की संख्या बढ़ने से भी पेंडिंग मामलों में इजाफा होता है।
सरकार और न्यायिक सुधार की कोशिशें
हालांकि सरकार और न्यायपालिका समय-समय पर सुधार की पहल करती रही है। डिजिटल कोर्ट प्रणाली, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ई-फाइलिंग जैसी तकनीकों का प्रयोग बढ़ाया जा रहा है। इनसे मामलों की सुनवाई तेज करने की कोशिश की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद कई निचली अदालतों में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स और विशेष अदालतें भी स्थापित की गई हैं। इनका उद्देश्य खास मामलों जैसे महिला और बाल सुरक्षा, आर्थिक अपराध, और घरेलू हिंसा के मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीक या फास्ट ट्रैक कोर्ट्स से समस्या हल नहीं होगी। जजों की संख्या बढ़ाने, अतिरिक्त कर्मचारियों को नियुक्त करने और मामलों की प्राथमिकता तय करने की प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने की जरूरत है।
जनता पर असर
पेंडिंग मामलों की बढ़ती संख्या आम नागरिकों पर सीधे असर डाल रही है। लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था में कम होता जा रहा है। विशेषकर संपत्ति विवाद और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में देरी से आम लोगों की आर्थिक और सामाजिक परेशानियां बढ़ती हैं। कई लोग मामलों का निपटारा होने तक न्याय पाने की उम्मीद खो देते हैं।
साथ ही, न्याय में देरी से अपराधियों को भी लाभ मिल सकता है। लंबित मामलों के कारण सजा में विलंब होता है और कुछ मामलों में अपराधी कोर्ट प्रक्रिया में पेंच डालकर बच निकलते हैं।
दिल्ली में निचली अदालतों में 15 लाख से अधिक पेंडिंग मामलों की संख्या इस बात का संकेत है कि न्याय प्रणाली को सुधार की आवश्यकता है। जजों की संख्या बढ़ाना, तकनीकी संसाधनों का व्यापक इस्तेमाल और सुनवाई प्रक्रिया को तेज करना जरूरी है। तभी आम जनता को समय पर न्याय मिल सकेगा और न्याय व्यवस्था पर विश्वास कायम रहेगा।







