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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान वैश्विक हालात, विशेष रूप से अमेरिका-ईरान जैसे बढ़ते तनाव और युद्धों पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया जिस संकट से गुजर रही है, उसकी जड़ स्वार्थ और सत्ता की राजनीति है, और यदि यही स्थिति बनी रही तो विश्व विनाश के कगार पर पहुंच सकता है।
भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि आज के युद्ध किसी आदर्श या न्याय के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्वार्थों के कारण लड़े जा रहे हैं। यही कारण है कि दुनिया में अस्थिरता और संघर्ष लगातार बढ़ रहे हैं। उन्होंने संकेत दिया कि मध्य-पूर्व जैसे क्षेत्रों में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
अपने भाषण में उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे समय में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके अनुसार, भारत के पास केवल राजनीतिक या सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है, जो पूरी दुनिया को एकजुट करने की क्षमता रखती है। भागवत ने कहा कि भारत की यही विशेषता उसे बाकी देशों से अलग बनाती है।
उन्होंने विशेष रूप से “सनातन धर्म” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल एक धार्मिक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सार्वभौमिक पद्धति है, जो सभी को साथ लेकर चलने और विविधताओं को स्वीकार करने की शिक्षा देती है। यही सिद्धांत आज की दुनिया को चाहिए, जहां विभाजन और संघर्ष बढ़ते जा रहे हैं।
भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत को केवल उपदेश देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे अपनी शक्ति भी बढ़ानी होगी। उन्होंने कहा कि “दुनिया ताकत की भाषा समझती है, इसलिए भारत को मजबूत बनना जरूरी है।” साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि शक्ति और नैतिकता का संतुलन ही भारत की असली पहचान है।
उनके अनुसार, अगर भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों—जैसे सहिष्णुता, समरसता और ‘वसुधैव कुटुंबकम’—को अपनाते हुए आगे बढ़े, तो वह वैश्विक संघर्षों को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत के पास ऐसा दृष्टिकोण है जो सभी देशों को जोड़ सकता है, न कि तोड़ सकता है।
भाषण के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में धर्म के नाम पर होने वाले संघर्षों का असली कारण धर्म की गलत समझ है। यदि “धर्म” को सही तरीके से समझा जाए, तो वह विभाजन नहीं बल्कि एकता का मार्ग दिखाता है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म का मूल सिद्धांत ही यह है कि सभी रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है।
मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में, जहां एक ओर अमेरिका-ईरान तनाव, तो दूसरी ओर अन्य अंतरराष्ट्रीय संघर्ष बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में भागवत का यह बयान भारत की संभावित भूमिका पर नई बहस छेड़ता है। क्या भारत वास्तव में वैश्विक शांति का नेतृत्व कर सकता है? यह सवाल अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठने लगा है।
कुल मिलाकर, नागपुर में दिया गया यह भाषण केवल एक वैचारिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। भागवत ने साफ कहा कि यदि दुनिया को युद्ध और संकट से बाहर निकालना है, तो उसे केवल ताकत नहीं, बल्कि मूल्यों और विचारधारा की भी जरूरत होगी—और यह क्षमता भारत के पास मौजूद है।






