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गरीबी कभी-कभी इंसान की सबसे बड़ी परीक्षा लेती है, लेकिन कुछ लोग इसी कठिनाई को अपनी ताकत बना लेते हैं। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के मृगिछामी गांव की रहने वाली दीपाली मुरा ऐसी ही एक प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने संघर्षों से लड़कर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की। कभी जिनके पास अपने परिवार का पेट पालने के लिए पैसे नहीं थे, आज वही दीपाली सालाना 10 लाख रुपये से ज्यादा का कारोबार कर रही हैं और अपने साथ 50 से अधिक ग्रामीण आदिवासी महिलाओं को रोजगार दे चुकी हैं।
दीपाली मुरा का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। वह मुंडा आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं, जहां गरीबी और संसाधनों की कमी आम बात है। साल 2009 में शादी के बाद दीपाली का जीवन और कठिन हो गया। उनके पति किसान थे और परिवार की आय इतनी कम थी कि चार लोगों का गुजर-बसर करना भी मुश्किल था। उनके पास एक बीघा जमीन थी, जहां से वे साबै घास (Sabai Grass) उगाती थीं। लेकिन उस समय उन्हें इस घास से केवल साधारण रस्सियां बनाना ही आता था, जिससे दिनभर की मेहनत के बाद मुश्किल से 50 रुपये की आमदनी होती थी।
लेकिन दीपाली ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी परिस्थितियों को बदलने की ठान ली। साल 2013 में उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया, जब यूनेस्को (UNESCO) की ओर से एक 10-दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इस वर्कशॉप में दीपाली ने सीखा कि कैसे साबै घास से पारंपरिक कला को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर आकर्षक सजावटी सामान तैयार किए जा सकते हैं।
इसी प्रशिक्षण ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने महज ₹5,000 की पूंजी से अपने घर पर एक छोटी सी वर्कशॉप शुरू की। शुरुआत में उन्होंने टोकरी, मैट, शोपीस और होम डेकोर प्रोडक्ट बनाना शुरू किया। इन उत्पादों की सुंदरता और पारंपरिकता ने जल्द ही लोगों का ध्यान खींचा। पहले उन्होंने स्थानीय मेलों और हस्तशिल्प प्रदर्शनियों में अपने उत्पाद बेचना शुरू किया, फिर धीरे-धीरे उनके काम को राज्य और देशभर में पहचान मिलने लगी।
आज दीपाली मुरा का साबै घास से बना हुआ सामान देश के कई हिस्सों में बिक रहा है। उनका वार्षिक टर्नओवर 10 लाख रुपये से अधिक पहुंच चुका है। उन्होंने अपने जैसे गरीब और संघर्षरत महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ा। आज 50 से ज्यादा आदिवासी महिलाएं उनके साथ काम कर रही हैं और आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
दीपाली कहती हैं, “मैंने गरीबी से बहुत कुछ सीखा। जब पास में कुछ नहीं था, तब मैंने अपने गांव की मिट्टी और घास में अपनी उम्मीदें तलाशीं। आज मैं चाहती हूं कि कोई और महिला गरीबी के कारण अपने सपने न छोड़े।”
उनके इस प्रयास को कई संस्थाओं ने सराहा है। स्थानीय प्रशासन से लेकर कई गैर-सरकारी संगठन (NGO) तक उनके काम को बढ़ावा दे रहे हैं। साबै घास से बना यह व्यवसाय न केवल पर्यावरण के लिए टिकाऊ है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रहा है।
आज दीपाली मुरा का नाम न केवल पुरुलिया जिले में बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल में महिला सशक्तिकरण की मिसाल के रूप में लिया जाता है। उनकी सफलता इस बात का सबूत है कि सीमित संसाधनों और गरीबी के बावजूद अगर हौसला मजबूत हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।
उन्होंने अब अपने कारोबार को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी विस्तार देना शुरू किया है ताकि उनके उत्पाद देशभर में और ज्यादा लोगों तक पहुंच सकें। आने वाले समय में वह अपने ब्रांड को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का सपना देख रही हैं।
दीपाली मुरा की कहानी यह दिखाती है कि आत्मनिर्भरता केवल शब्द नहीं, बल्कि एक सोच है — एक ऐसी सोच जो किसी भी व्यक्ति को उसकी परिस्थितियों से ऊपर उठकर अपने जीवन का रास्ता खुद बनाने की ताकत देती है।
गरीबी से निकलकर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंची दीपाली मुरा आज हजारों ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इच्छा शक्ति मजबूत हो, तो 5,000 रुपये की छोटी पूंजी भी किसी बड़े सपने को साकार कर सकती है।







