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तैराकी के इतिहास के सबसे महान ओलंपियन माइकल फेल्प्स ने अपनी दृढ़ विजयी मानसिकता और ओलंपिक में अपने रिकॉर्ड-तोड़ करियर के बारे में खुलकर कहा है कि उनके लिए सिर्फ़ स्वर्ण पदक ही वास्तव में मायने रखते हैं। फेल्प्स का मानना है कि सिल्वर और ब्रॉन्ज पदक हार के संकेत हैं, न कि सफलता की पूर्ति।
स्वर्ण की मानसिकता: “सिल्वर और ब्रॉन्ज हार हैं”
फेल्प्स ने राज शमानी के “Figuring Out” पॉडकास्ट में कहा कि ओलंपिक में जीते गए 28 पदकों में से सिर्फ़ 23 स्वर्ण ही असली उपलब्धियाँ हैं, क्योंकि उनके नजरिए में दूसरा या तीसरा स्थान रखने का मतलब है कि किसी ने उस दिन आपसे बेहतर तैयारी की थी।
उन्होंने कहा,
“जैसा मैंने कहा अभी तक मुझे पता ही नहीं है कि मेरे पास कितने सिल्वर और ब्रॉन्ज हैं… सिल्वर तो हार है, है न? आपने दूसरा स्थान पाया — आप हार गए। तीसरा स्थान? फिर से हार है।”
उनके अनुसार गोल्ड ही वह संकेत है जो उत्कृष्टता और वास्तविक जीत को दर्शाता है।
अपरंपरागत इतिहास — पांच ओलंपिक में श्रेष्ठता
फेल्प्स का करियर पाँच ओलंपिक तक फैला हुआ है, जिसमें उन्होंने 23 स्वर्ण, 3 रजत और 2 कांस्य पदक जीते — कुल 28 पदक हासिल किए। फेल्प्स को अक्सर सबसे अधिक सम्मानित ओलंपियन माना जाता है, जिसने तैराकी में अपनी अद्वितीयता और निरंतरता से खेल का इतिहास बदल दिया।
उन्होंने अपनी श्रेष्ठता को 2008 के बीजिंग ओलंपिक में एकल खेल में आठ स्वर्ण जीतकर स्थापित किया, जो किसी भी आधुनिक ओलंपियन का एकल ओलंपिक में सर्वाधिक स्वर्ण का रिकॉर्ड है।
मनःस्थिति और विजयी दृष्टिकोण
फेल्प्स का यह कथन उनकी मानसिक दृढ़ता और प्रतिस्पर्धा की तीव्रता को भी दर्शाता है। उन्होंने कहा कि दूसरे या तीसरे स्थान ने उन्हें यह याद दिलाया कि उनकी तैयारी में कहीं कमी रह गई है, और यह विचार ही उन्हें लगातार स्वर्ण के लिए प्रेरित करता रहा।
इस बयान ने खेलों में मेडल की अहमियत और एथलीट की मानसिकता को लेकर नई बहस भी शुरू कर दी है, कि क्या केवल स्वर्ण ही “सफलता” मानी जानी चाहिए?








